सिर्फ बदलाव ही रह जाता है बाकी सब बदल जाता है

सिर्फ बदलाव ही रह जाता है बाकी सब बदल जाता है

हर पीढ़ी के अपने एक अलग संघर्ष हैं। अगर हम अपने से पिछले जमाने की बात करें तो उस दौर में रोज का जीवन गुजारना भी अपने आप में एक संघर्ष हुआ करता था। रोजमर्रा के काम भी अपने आप में एक चुनौती थे। लेकिन हां वो पीढ़ी अपने आप में कुछ क्रांतियां लाई थी। जैसे कि घर में चूल्हे की जगह गैस का आना, रेफ्रिजरेटर का स्वीकार किया जाना और सिल बट्‌टे की जगह मिक्सी का आना। आज अगर हम देखें तो यह बात हमें बहुत मामूली लगती है कि इसे स्वीकार करने में भला क्या परेशानी हुई होगी? लेकिन नहीं शायद थोड़ी नहीं बहुत परेशानी हुई होगी। वो लोग जो ईंधन जलाकर बरसों से अपना खाना पकाते आए होंगे उन्हें डर लगा होगा गैस का नॉब घुमाते वक्त कि इतनी सहजता से कैसे गैस को स्वीकारें। कहीं गैस लीक हो गई तो? कहीं आग लग गई तो? ऐसा तो नहीं कि सिलेंडर फट जाएगा? हां लेकिन उन्होंने बदलाव को स्वीकारा, बस ऐसे ही बदलावों को हमें स्वीकार करते हुए आगे बढ़ते जाना है। हम सभी 90 के दशक के लोगों के जीवन में अब जेन ज़ी नए सपनों और ख्वाहिशों और हाथों में मोबाइल लेकर खड़ी है। अपने पुराने किस्सों के साथ अब हमें एक नई सरगम के साथ ताल मिलानी है। अब हमें समझना और स्वीकार करना है कि अब गली में आइसक्रीम वाला नहीं आता, जो भी मन करता है हम उसे ऑर्डर कर सकते हैं।

यह विकास का कदम है

अगर आप न्यूट्रल होकर देखेंगे तो आपको लगेगा कि इंसान जिस दौर में रहता है वो उस दौर को बेस्ट समझता है। जैसे कि हम लोगों को 90 का दौर सुनहरा लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि हम उस दौर से हैं। जब हम छोटे थे तो छतों पर सोया करते थे। घूमने जाने के नाम पर हम अपने रिश्तेदारों के यहां जाया करते थे। हमारे घर में एक लैंडलाइन फोन होता था। हम कज़िन्स की अपनी एक मंडली हुआ करती थी। लेकिन अगर हम अपनी पिछली पीढ़ी की बात करें तो उन्हें अपना दौर खूबसूरत लगता था। वो साइकिल से और पैदल चलने की बात किया करते थे। उनके जिक्र में गांव की पगडंडी होती थी। वो बताते थे कि वो कैसे खेतों पर जाते थे। कैसे दूसरों के खेतों में घुसकर मस्ती किया करते थे। उन लोगों को लगता था कि हम बहुत आसान जिंदगी जी रहे हैं। हम तो स्कूल बस से स्कूल जाते हैं, वो तो स्कूल भी पैदल जाया करते थे और वो भी कई कोस दूर।

तो आखिर कौन सा दौर अच्छा

मुद्दे की बात यह है कि हर जमाना अच्छा और बुरा दोनों होता है। आज हम जिस तरह से वर्चुअल दुनिया को बुरा समझ रहे हैं, पिछले जमाने में लोग टेलीविजन और रेडियो को ऐसा ही समझा करते थे। हां, समाचार देखने और सुनने का ट्रेंड था। लेकिन फिल्म देखा जाना हर घर में पसंद नहीं किया जाता था। ऐसा ही हाल गानों के प्रोग्राम को लेकर भी होता था। लेकिन समय बदला और समय के साथ बहुत कुछ बदल गया। आज हम इस वर्चुअल दुनिया को देख और समझ रहे हैं। कुछ लोग इन नए जमाने के खिलौनों के साथ अपना मन बहला रहे हैं, वहीं आपको कुछ लोग ऐसे भी मिल जाएंगे जिन्हें नहीं पता कि रील कहते भी किसे हैं। या फिर सोशल मीडिया की लाइफ क्या है? अब हम इस पर चर्चा नहीं करेंगे कि यह अच्छा है या बुरा है? बस यह है कि आज लोग अपने मोबाइल में सभी कुछ रिकॉर्ड कर लेना चाहते हैं।

जेन ज़ी को भी जान लेते हैं

इस वक्त जिन लोगों का दौर है वो लोग जेन ज़ी कहलाते हैं। इनके बारे में कहा जाता है कि मोबाइल की दुनिया में मस्त इन लोगों को दुनिया के दांव-पेंच नहीं आते। इनकी अपनी एक वर्चुअल सी दुनिया है। लेकिन नहीं, जेन ज़ी अपने आप में बेशक मस्त है लेकिन अपने अधिकारों को लेकर वह जागरूक हैं। आप कार्यक्षेत्र को ही देख लीजिए। पहले सीनियरिटी की वजह से कार्यक्षेत्र पर बहुत से लोगों का शोषण हुआ है। उनसे लोगों ने अपने भी काम करवाए हैं। जिनका क्रेडिट उन लोगों को नहीं मिल पाया। लेकिन आज की जेन ज़ी अपने अधिकारों को लेकर पूरी तरह सजग है। हां, ठीक है वो सेल्फ-सेंटर्ड हैं लेकिन वो किसी की चीज पर अपना क्रेडिट लेते भी नहीं और देते भी नहीं। वो आउटपुट पर विश्वास रखते हैं। अपने कमिटमेंट को लेकर वो सीरियस हैं। उनके आस-पास के लोगों को भी पता है कि अगर उनसे बदतमीजी की तो लिमिट क्रॉस करने में वो भी वक्त नहीं लगाएंगे।

बस हमें बदलाव को समझना है

आगे हमारे जीवन में ही बहुत कुछ बदलने वाला है। हम जितना सीख सकते हैं, जितना स्वीकार कर सकते हैं, वो अगर हमारे नैतिक दायरे में आता हो तो हमें जरूर करना चाहिए। अपनी सोच को हम सभी को प्रोग्रेसिव रखना होगा। क्योंकि बदलाव ही एक ऐसी चीज है जो स्थायी है, बाकी सभी कुछ बदल और गुजर जाता है।

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