अगर यह आज़ादी है तो सुकून और खुशी कहां खो गई?

अगर यह आज़ादी है तो सुकून और खुशी कहां खो गई?

हम इंसानों की फितरत एक परिंदे जैसी है। हम उड़ना चाहते हैं बहुत दूर। इतना ही नहीं, अगर हमारे आस-पास उसूलों के कुछ बंधन होते हैं तो बहुत लोगों के मन में उसूलों को तोड़कर अपनी आज़ादी को पा लेने का ख्याल आता है। और आज कहीं ना कहीं लोगों ने अपनी उस आज़ादी को पा भी लिया है। अपने लिए सोचना, अपने पैसे को सिर्फ अपने पर खर्च करना अब आम हो गया है। अब तो आलम यह है कि लोगों को अपने पड़ोस में कौन रहता है इसका भी पता नहीं होता। आखिर हम तथाकथित आज़ाद लोग अपने में इतना गुम हैं कि अपने आस-पास की चीज़ों को देखकर भी देखना नहीं चाहते। लेकिन खुद पर केंद्रित आज की ज़िंदगी क्या वाकई में बहुत अच्छी है? इस आज़ादी की कीमत कहीं हमने अपने सुकून को खोकर तो नहीं चुकाई? यह सोचने की बात है क्योंकि इस आज़ादी की कीमत एक अकेलापन भी है...

लिव इन और हम

यह ज़िंदगी आपकी है जनाब, अगर आप यह तय कर रहे हैं कि आप किसके साथ रहेंगे तो इसमें कोई गलत बात नहीं है। लेकिन लिव इन में बिना किसी ज़िम्मेदारी के रहना और पसंद ना आने पर अपने रास्तों को अलग कर लेना क्या सच में आपको आज़ाद करता है? नहीं, ऐसा हो ही नहीं सकता। साथी का साथ छूटने का गम, उसके बाद मूव ऑन करने की जुस्तुजू... वो प्रोसेस है जहां इंसान की भावनाएं जैसे उसे तोड़कर रख देती हैं। आखिर आज़ाद लोगों के दिल में भी अरमानों से भरा एक दिल धड़कता है और जब इस जज़्बे को ठेस पहुंचती है तो उसकी सुगबुगाहट इस दिल तक भी आती है। तभी तो आपने देखा होगा कि इस तरह के ज़्यादातर लोगों में एंज़ाइटी, डिप्रेशन और अकेलापन ज़्यादा पाया जाता है।

पैसा और आज़ादी

हमने वो दौर भी देखा है जब घर में पांच शादीशुदा भाई एक साथ रहा करते थे। यह बात बिल्कुल नेचुरल है कि पांच लोगों की एक जैसी कमाई तो हो नहीं सकती थी। लेकिन कभी उस घर में गरीब भाई फटेहाल नज़र नहीं आया तो कभी उनका अमीर भाई अपने पैसे को फ्लॉन्ट करता नज़र नहीं आया। नज़र आया तो घर का एक खूबसूरत सा निज़ाम और सफेदपोशी। वो गरीब थे या अमीर, लेकिन वो सभी लोग एक साथ बहुत खुश रहते थे। और आज के लोगों को देखें तो अक्सर हसबैंड-वाइफ दोनों ही वर्किंग हैं। पैसे की कोई कमी है ही नहीं। ऑनलाइन शॉपिंग, वीकेंड पर मस्ती, फॉरेन ट्रिप्स के बावजूद भी लोग खुश नहीं हो पा रहे।

घर की चाबी बुज़ुर्ग

पहले के ज़माने में घर के बुज़ुर्ग अपनी एक अलग हैसियत रखते थे। उनके होने से घर की हर चीज़ सही तरीके से और तयशुदा अंदाज़ में होती थी। उस ज़माने में महिलाएं जॉब नहीं करती थीं लेकिन हर काम को करने का एक टाइम फिक्स होता था। आज़ादी के नाम पर अब लोगों ने इन सब चीज़ों को त्याग दिया है।

पार्टी लवर नहीं पार्टी एनिमल

आज के दौर में वीकेंड को पब जाना और पार्टीज़ करना आम हो गया है। अब तो हार्ड ड्रिंक्स लेना भी बुरा नहीं माना जाता। लोग वैलेंटाइन डे और रोज़ डे तक ही सीमित नहीं रहे। अब तो हैलोवीन डे पर भूतिया मेकअप कर यह पार्टी एनिमल्स जश्न-ए-आजादी मनाते हैं।

लेकिन फिर क्यों?

अगर यह लोग यह सब करके बहुत खुश और सुकून में होते तो शायद इस आज़ादी को अच्छा ही समझा जाता। लेकिन इस तरह की ज़िंदगी को जीते लोग एक अजीब सी कश्मकश में अपनी ज़िंदगी को गुज़ार रहे हैं। वक्त है खुद को दोबारा से सजाने का और दोबारा वो हासिल करने का जिसे छिटककर कभी खुद से दूर किया था। अपनी जिंदगी में आपको दोबारा खुशियों की गली को ढूंढना होगा। उस गली में ही आपको अपने अपने खिलखिलाते मिलेंगे। आप यकीन जाने उन रंगों में ही आपकी ज़िन्दगी और सुकून छिपा है। आज़ाद होने की क़ीमत आपने अपने सुकून को खोकर पाई है। अभी भी देर नहीं हुई अब दोबारा कर लीजिए वो हासिल जो आप ही का है।

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