हमने एडजस्ट करने को ही कॉम्प्रोमाइज करना समझ लिया

हमने एडजस्ट करने को ही कॉम्प्रोमाइज करना समझ लिया

यह रील देखने का दौर है। एक बार ऐसे ही रात को नींद नहीं आ रही थी और मैं रील देख रही थी। तब अचानक एक स्क्रॉल करते करते एक रील आई और उसमें था कि अब तो हम एडजस्ट करने को ही कॉम्प्रोमाइज करना समझ रहे हैं और यही वजह है कि हम सभी के आपस के रिलेशन खट्टे और धीरे धीरे कड़वे होते जा रहे हैं। यही बात सच में बहुत गहरी और समझने वाली थी। वाकई हम लोगों को क्या हो गया। अगर हम अपने आस पास लोगों को देखें तो कोई भी आपस में ज्यादा एक दूसरे को बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। किसी की किसी से नहीं बन रही। यहां तक कि न्यूक्लियर फैमिली में भी अजीब सा खिंचाव देखने को मिल रहा है।

जानते हैं यह है क्या

असल में अगर कॉम्प्रोमाइज और एडजस्ट करने को देखें तो कॉम्प्रोमाइज नेगेटिविटी लिए हुए है और एडजस्ट करने में एक सामाजिकपन है और एक पॉजिटिविटी है। इसे एक उदाहरण से हम समझ सकते हैं मान लीजिए कि एक कमरे में दस लोग हैं जिन्हें कोई इनाम मिलने वाला है। लेकिन अगर किसी एक और को भी किसी तरह से उस कमरे में आने के लिए जगह बनाई गई तो यह सभी लोगों का एडजस्टमेंट होगा। वहीं अगर किसी एक को निकाल कर एक को घुसाया गया तो यह कॉम्प्रोमाइज है।

तो गलत कहां हुआ

अब असल में हुआ यह कि आजकल के इस भागादौड़ी के ज़माने में किसी से कॉम्प्रोमाइज करने की उम्मीद नहीं कर सकते और कोई करने को तैयार भी नहीं है। लेकिन अब लोग एडजस्ट करने को ही कॉम्प्रोमाइज करना समझ रहे हैं। और ना चाहते हुए भी अपने अंदर एक नेगेटिविटी को भर रहे हैं और उन्हें लग रहा है कि वो पता नहीं कि कितने कॉम्प्रोमाइज कर रहे हैं। आज से दस पंद्रह साल पहले जब लोग जॉइंट फैमिली में रहते थे तो हर किसी को लगता था कि सबसे ज्यादा अगर किसी ने समझौते किए हैं तो वो वहीं हैं। यह सोच जब ज्यादा हावी होने लगी तो जॉइंट फैमिलीज टूटने लगी। लोग न्यूक्लियर फैमिली पसंद करने लगे और अपने छोटे से संसार में खुश रहने लगे। लेकिन आज जब हम देखते हैं तो जान पाते हैं कि छोटे छोटे परिवार ही आपस में खुश नहीं हैं। हसबैंड वाइफ और एक बच्चा आपस में एक अच्छा रिलेशन कैरी नहीं कर पा रहे। इसकी सबसे बड़ी वजह है कि हम में से कोई भी आज एडजस्ट करने को तैयार नहीं है।

तो होगा क्या

हम सभी ने दूसरों को तो बहुत सुधार लिया लेकिन अब एक बार अपने गिरेबान में झांकने की ज़रूरत है। ज़रूरत है खुद से यह सवाल पूछने कि हम सभी कुछ अपने मुताबिक क्यों चाहते हैं? क्यों ऐसा होता है कि अगर हमारे साथ ही रहने वाला कोई कुछ और करना चाहे तो हम बर्दाश्त नहीं कर पाते। मत भूलिए कि हम लोग एक सामाजिक प्राणी हैं। एक दूसरे के साथ रहना हम सभी के लिए ज़रूरी है। हर इंसान दूसरे इंसान से अलग होता है। हर किसी का अपना एक स्वभाव होता है। यहां तक कि दो बहनों के स्वभाव भी एक दूसरे से जुदा होते हैं। बस हमें एक दूसरे के साथ खुशी के साथ रहना और एक दूसरे के अलग को समझना बेहद ज़रूरी है। अगर हम सब ऐसा नहीं करेंगे तो हम सभी लोग बहुत अकेले पड़ जाएंगे। रिश्तों को दीमक की तरह खा रही है हमारी नेगेटिव अप्रोच। अभी भी देर नहीं हुई। यह हमारे जीवन को जीवंत रखने के लिए ज़रूरी है।

बच्चे भी सीखेंगे

यह बात तो हम सभी जानते हैं कि जो भी हम करते हैं उसका असर हमारे बच्चों पर पड़ता है। जब हम अपनी एडजस्ट करने की फितरत को डेवलप करेंगे तो बच्चे भी इस बात को आसानी से समझ पाएंगे कि सभी कुछ हमारे हिसाब से नहीं होता। बहुत चीजें दूसरे के हिसाब से भी होती हैं। वो भी उतनी ही सही हो सकती हैं जितनी कि हमारी। ऐसा करने से उनके एडजस्ट की खूबी कब में आ जाएंगी आपको पता भी नहीं चलेगा। आप विश्वास करें जीवन में आप जितने एडजस्टिंग होंगे आप उतनी ही टेंशन फ्री लाइफ को गुज़ार पाएंगे।

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