जिंदगी में कोई काम छोटा नहीं होता, संसद में बंदर भगाने का काम कर रहे असलम हैं इसका सशक्त उदाहरण

जिंदगी में कोई काम छोटा नहीं होता, संसद में बंदर भगाने का काम कर रहे असलम हैं इसका सशक्त उदाहरण

हम अपने बड़ों से सुनते आए हैं कि कुछ काम करो, काम करने में शर्म मत करो, कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता। बस काम काम होता है। लेकिन दिल्ली के संसद भवन में असलम का काम छोटा या बड़ा, बात की बात है, लेकिन रोचक बहुत है। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि संसद परिसर में वो बंदर भगाने की नौकरी करते हैं। दिन भर वे जहां कहीं भी बंदरों को देखते हैं, एक आवाज निकालते हैं और बंदर उस आवाज को सुनकर ही डरकर भाग जाते हैं।

क्या है वो आवाज

असल में असलम अपने मुंह से लंगूर की आवाज निकालते हैं। हम सभी जानते हैं कि बंदर और लंगूर की दुश्मनी बरसों पुरानी है। बंदरों के मुकाबले लंगूर शरीर से ज्यादा मजबूत होते हैं। ऐसे में इस दुश्मनी का फायदा बलशाली लंगूर ही उठाते हैं। आमने-सामने होने पर कई बार यह छोटे बंदरों पर आक्रमण कर देते हैं। यही कारण है कि जैसे ही बंदर लंगूर की आवाज सुनते हैं, वहां से भाग लेने में ही अपनी भलाई समझते हैं। बंदरों की इसी कमजोरी का इस्तेमाल अब उन्हें वीआईपी जगहों से भगाने के लिए किया जा रहा है। साइकोलॉजिकल रूप से यह इनसे डरते हैं। मुख्य रूप से देश की राजधानी नई दिल्ली के प्रमुख सरकारी परिसरों, वीआईपी इलाकों और बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों के स्थलों पर मानव लंगूर नियुक्त किए जा रहे हैं। ये ऐसे प्रशिक्षित लोग होते हैं, जो लंगूर की हूबहू आवाज निकालकर बंदरों को डराकर भगाते हैं।

कटआउट हुए बेअसर

पहले दिल्ली में बहुत-सी जगहों पर लंगूरों के कटआउट जगह-जगह लगाए जाने लगे थे। इन कटआउट से बंदर काफी डरने लगे थे। लेकिन बंदर भी कम स्मार्ट नहीं होते। वो समय के साथ इस कटआउट की कहानी को समझ गए। अब वो कटआउट पर ही बैठ जाते हैं। आखिर उन्होंने भी 'डर के आगे जीत है' वाली बात को समय के साथ समझ लिया। ऐसे में अब मानव लंगूर नियुक्त किए जाते हैं, जो लंगूरों की आवाज निकालकर वीआईपी परिसर में गश्त करते हैं।

मानव लंगूर हैं असलम

असलम फिलहाल संसद भवन परिसर में कार्यरत हैं। इससे पहले वे दिल्ली के तीस हजारी कोर्ट में नियुक्त थे। वे कहते हैं कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के तहत साल 2012 से भारत में असली लंगूरों को बंधक बनाने और उनका व्यावसायिक उपयोग करने पर पूरी तरह प्रतिबंध है। पहले लंगूर साथ में रखते थे। लेकिन अब इंसानों द्वारा निकाली गई आवाज ही मुख्य विकल्प है। यह लंगूरों को भगाने का एक बेहद सुरक्षित तरीका है।

आपको बता दें कि मंत्रियों और विधायकों की सुरक्षा के लिए दिल्ली लोक निर्माण विभाग (PWD) बाकायदा लंगूर की आवाज निकालने वाले विशेषज्ञों की भर्ती के लिए टेंडर जारी करता है। असलम भी इसी अनुबंध पर रखे गए एक कर्मचारी हैं। उनकी सैलरी 18,000 रुपये प्रति माह है। संसद परिसर में वे दिनभर आपको गश्त करते मिल जाएंगे।

चर्चा में आई थी वैकेंसी

सभी जानते हैं कि दिल्ली में बंदरों की समस्या कितनी ज्यादा है। वेबसीरीज मामला लीगल है में भी यह समस्या उजागर हुई थी। जनवरी माह में जब मानव लंगूर के लिए वेकेंसी निकली थी, तो अपनी तरह की इस अनोखी वेकेंसी की चर्चा देशभर में हुई थी। इसकी मुख्य योग्यता बंदर जैसी आवाज निकालने का कैलिबर था। आपको बता दें कि दिल्ली विधानसभा परिसर और आसपास दर्जनों बंदर हैं, जो तार और डिश एंटीना पर कूदकर उन्हें तोड़कर परेशानी पैदा करते हैं। 2017 की वो घटना तो याद ही होगी, जब बंदर सदन में घुस गया था और सरकारी स्कूलों में गेस्ट टीचरों पर चल रही चर्चा में बाधा डाली थी। वहीं इन बंदरों का टीन पर कूदकर शोर मचाना तो बहुत आम बात है।

मानव लंगूर को पीवी सिंधु ने भी सराहा

असलम जैसे मानव लंगूर हमारे जीवन को सहज बनाने का काम बहुत सार्थक तरीके से कर रहे हैं। नई दिल्ली के इंदिरा गांधी इंडोर स्टेडियम में 17 से 23 अगस्त वर्ल्ड बैडमिंटन चैंपियनशिप का आयोजन किया जा रहा है। 17 साल बाद यह चैंपियनशिप भारत में हो रही है। यहां बंदरों की वजह से कोई व्यवधान न हो, इसलिए 3 प्रोफेशनल 'मंकी व्हिस्परर्स' (लंगूर की आवाज निकालने वाले विशेषज्ञ) को तैनात किया गया है। यह अनूठा कदम जनवरी में हुए 'इंडिया ओपन' के दौरान बंदरों और पक्षियों के कारण हुए व्यवधान के बाद उठाया गया है। भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु ने भी इस कदम की बहुत सराहना की है।

सबसे बड़ी बात है कि इससे इन बेजुबानों को भी कोई नुकसान नहीं हो रहा। वहीं बंदरों के आतंक से भी छुटकारा मिल रहा है।

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