कर्कश आवाज, लंबी कद-काठी और जोड़ी में जिंदगी... ये है सारस की कहानी

कर्कश आवाज, लंबी कद-काठी और जोड़ी में जिंदगी... ये है सारस की कहानी

भरतपुर की धरती पर एक ऐसी आवाज सुनाई देती है, जो पहली बार सुनने पर भले ही कर्कश लगे, लेकिन अपने आप में बेहद खास है। यह आवाज है सारस क्रेन की। करीब 6 फीट तक ऊंचा खड़ा होने वाला सारस अपनी लंबी टांगों, लाल सिर और गर्दन तथा शानदार कद-काठी के लिए पहचाना जाता है। सारस का वैज्ञानिक नाम Antigone antigone है और इसे दुनिया का सबसे ऊंचा उड़ने वाला पक्षी माना जाता है। नर की ऊंचाई करीब 1.8 मीटर तक पहुंच सकती है। सारस की सबसे खास बात इसकी जोड़ी है। नर और मादा देखने में लगभग एक जैसे होते हैं और अक्सर जोड़े में नजर आते हैं। यह पक्षी लंबे समय तक एक ही साथी के साथ रहने और मजबूत पेअर बॉन्ड के लिए जाना जाता है। नर-मादा साथ मिलकर तेज आवाज में यूनिसन कॉलिंग (unison calling) करते हैं। यही आवाज सारस की पहचान बन चुकी है। अगर आप भी इस आवाज को जानना और समझना चाहते हैं तो भरतपुर का पक्षी अभ्यारण्य आपके लिए एक यादगार अनुभव रहने वाला है। राजस्थान की राजधानी जयपुर से केवल दो घंटे दूर भरतपुर का यह अभ्यारण्य आपको नेचर और परिंदों से दोस्ती करने का एक मौका देता है।

जानते हैं क्या पसंदीदा हैबिटाट

दलदली जमीन, तालाब, झील, उथली वेटलैंड्स और पानी वाले खेत सारस का पसंदीदा हैबिटाट हैं। खास बात यह है कि यह केवल जंगलों तक सीमित पक्षी नहीं है। खेती वाले इलाकों, धान के खेतों और गांवों के आसपास मौजूद छोटे-बड़े वेटलैंड्स में भी सारस अपना ठिकाना बना सकता है। बारिश का मौसम सारस के लिए खास होता है। भारत में इसका ब्रीडिंग सीजन मुख्य रूप से मानसून के दौरान रहता है। आम तौर पर जुलाई से अक्टूबर के बीच प्रजनन गतिविधियां ज्यादा देखी जाती हैं। पानी से भरे उथले इलाकों में सारस घास और दूसरी जलीय वनस्पतियों से ऊंचा घोंसला बनाता है।

और अब सुनिए सारस की वह आवाज...

पहली बार सुनने पर यह आवाज कर्कश लग सकती है, लेकिन सारसों के लिए यह आपसी संवाद का अहम हिस्सा है। जोड़ा अक्सर एक साथ आवाज निकालता है। इसे यूनिसन कॉलिंग कहा जाता है और यह आवाज काफी दूर तक सुनाई दे सकती है। इसलिए अगली बार जब यह आवाज आपको सुनाई दे तो यह मत सोचिएगा कि ओह, कितनी कर्कश आवाज है, बल्कि यह सोचिएगा कि सारस का एक जोड़ा आपस में कुछ बातचीत कर रहा है।

भारत में कितने सारस हैं?

भारत में सारस की पूरी आबादी की कोई एक ताजा, देशव्यापी गणना उपलब्ध नहीं है। अलग-अलग अध्ययनों और संरक्षण संगठनों के अनुमानों में आंकड़े अलग-अलग मिलते हैं। वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया के अनुसार अकेले उत्तर प्रदेश में ही सारस की अनुमानित आबादी 19 हजार से ज्यादा है और उत्तर प्रदेश सारस का सबसे बड़ा स्ट्रॉन्ग होल्ड है। इसलिए भारत की कुल आबादी के बारे में कोई एक संख्या बताते समय सावधानी जरूरी है। अलग-अलग राज्यों की गणनाओं को जोड़कर देश की कुल आबादी बताना सही तरीका नहीं है। भरतपुर में क्या तस्वीर है? यहां 2026 का आंकड़ा बेहद महत्वपूर्ण है। 21 अप्रैल 2026 को केवलादेव घना राष्ट्रीय उद्यान में 43वीं सारस गणना आयोजित की गई। गणना के अनुसार केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के अंदर 22 सारस दर्ज किए गए। वहीं भरतपुर और डीग जिलों के आर्द्रभूमि क्षेत्रों को मिलाकर कुल 81 सारस दर्ज किए गए। इससे पहले यह संख्या 79 थी। यानी इस क्षेत्र में दो सारस की बढ़ोतरी दर्ज हुई।

भरतपुर में मेहमान नहीं है सारस

यह आंकड़ा एक महत्वपूर्ण बात बताता हैसारस को सिर्फ केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान की सीमा में देखकर उसकी पूरी भरतपुर क्षेत्र की आबादी नहीं समझी जा सकती। आसपास के वेटलैंड्स, तालाब और कृषि क्षेत्र भी इसके लिए महत्वपूर्ण हैबिटाट हैं। भरतपुर में सारस कब आता है? यह सवाल भी काफी दिलचस्प है। सारस भरतपुर का सामान्य अर्थों में मौसमी प्रवासी मेहमान नहीं है। भारतीय सारस मुख्य रूप से रेजीडेंट यानी स्थानीय रूप से रहने वाली प्रजाति है। यह सालभर एक ही व्यापक क्षेत्र में रह सकता है, हालांकि पानी और भोजन की उपलब्धता के अनुसार स्थानीय स्तर पर आवाजाही करता है।

यानी सारस को देखने के लिए नवंबर-दिसंबर तक इंतजार जरूरी नहीं है। हां, नवंबर से फरवरी के बीच भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में प्रवासी पक्षियों की संख्या तेजी से बढ़ जाती है। साइबेरिया, मध्य एशिया और यूरोप तक से कई प्रजातियां यहां सर्दियां बिताने पहुंचती हैं। इसी वजह से कई बार सारस को भी प्रवासी पक्षी समझ लिया जाता है।

कहां गए वो सारस

लेकिन एक क्रेन ऐसी भी थी, जिसका भरतपुर से रिश्ता टूट गया... वह थी साइबेरियन क्रेन। कभी हजारों किलोमीटर की यात्रा करके साइबेरियन क्रेन सर्दियों में भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान पहुंचती थी। बीसवीं सदी के दूसरे हिस्से में केवलादेव भारत में इस दुर्लभ पक्षी का प्रमुख विंटरिंग साइट था। लेकिन अब यह कहानी इतिहास बन चुकी है। भरतपुर में साइबेरियन क्रेन आखिरी बार वर्ष 2001 में एक जोड़े के रूप में देखी गई थी। उसके बाद यह पक्षी केवलादेव में दोबारा नहीं देखा गया। यानी आज भरतपुर में अगर आपको लंबी गर्दन, लाल सिर और विशाल कद वाला सारस दिखाई दे, तो वह कोई विदेशी प्रवासी मेहमान नहीं, बल्कि भारत का रेजीडेंट पक्षी है।

कभी केवलादेव में सैकड़ों सारसों की मौजूदगी दर्ज होती थी। 1983 में यहां पहली सारस गणना में 258 सारस दर्ज किए गए थे। बाद के वर्षों में संख्या में काफी उतार-चढ़ाव आया। 2023 की भरतपुर जिला गणना में 185 सारस दर्ज किए गए, जबकि 2024 में 143 दर्ज हुए। 2025 की गणना में भरतपुर-डीग के आर्द्रभूमि क्षेत्रों में 79 और 2026 में 81 सारस दर्ज किए गए। इन आंकड़ों में सर्वे क्षेत्र और गणना पद्धति के अंतर को ध्यान में रखना जरूरी है।

लेकिन कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं है। सारस का भविष्य उस पानी से जुड़ा है, जिसमें वह भोजन तलाशता है, जिस वेटलैंड्स में घोंसला बनाता है और जिन खेतों के आसपास अपना जीवन बिताता है। इसलिए भरतपुर में सुनाई देने वाली सारस की यह कर्कश आवाज सिर्फ एक पक्षी की आवाज नहीं... यह भरतपुर की वेटलैंड्स और उसके बदलते पर्यावरण की भी आवाज है।

(सीनियर जर्नलिस्ट अरबाज अहमद की फेसबुक वॉल से)

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