कुछ समय पहले एक शादी में जाने का मौका मिला। वहां जाकर देखा तो पता चला कि शादी में लोग ही नहीं हैं। रात के दस बजने को आए थे लेकिन मेहमानों के नाम पर दस बीस लोग नज़र आ रहे थे। खैर, आधे घंटे के अंदर ही वो दस बीस लोग अब चालीस लोगों में बदल गए। खैर, मुझ जैसे इंसान के लिए यह बहुत हैरान कर देने वाली चीज़ थी। ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे यहां तो शादी का मतलब खानदान और परिवार के लोगों का एक जमावड़ा होता है। जहां सौ दो सौ लोग तो किसी गिनती में ही नहीं होते। लेकिन शादी अगर तीस चालीस लोगों के बीच में ही निपट जा रही है तो इसे शायद मैं बदलते वक्त का एक अंदाज़ ही कहूंगी।
मां की बात याद आई
हां तो हम भी उस जेनरेशन से ही हैं जो अपने आप में व्यस्त और मस्त रहते हैं। लेकिन मेरी मां बहुत सोशल थीं। लोगों की बीमारी में हालचाल पूछना, शादी ब्याह में आना जाना उनको बहुत पसंद था। चूंकि उनको बहुत पसंद था तो हम लोग भी उनके साथ आया जाया करते थे। अगर कभी यह कह दो अरे मम्मी, छोड़ो क्या ज़रूरत है शादी में जाने की। तो वो बड़े तपाक से कहतीं थीं – हां कोई बात नहीं, तुम मत जाओ, कोई तुम्हारी में भी नहीं आएगा। यह तो खैर एक बात थी जो आई गई हो गई। लेकिन आज सच में ऐसा लग रहा है कि कोई किसी के यहां जाने को जैसे तैयार ही नहीं है। दूर के रिश्तेदारों को तो जैसे छोड़ ही दिया है। और अब सच में यह होता नज़र आ रहा है कि अब हर कोई बस क्लोज लोगों से ही मिलता-जुलता है। दूर की नाते रिश्तेदार अब रिश्तों में बहुत दूर हो चले हैं।
मेट्रो सिटीज़ में दिख रहा है
बचपन से सामाजिक विज्ञान की किताबों में हम पढ़ते लिखते आ रहे हैं कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसे लोगों के साथ रहना और अपने आसपास लोगों को देखना पसंद है। 90 की जेनरेशन के बहुत लोग जो अपने पेरेंट्स की वजह से अपनी सामाजिकता बनाए हुए थे। उन्हें जब मौका मिला बड़े शहरों में जाकर अकेले रहने का तो वो अपने परिवार के साथ एंजॉय करने लगे। लेकिन मन तो मन है। मन ढूंढता है लोगों को। आज गुरुग्राम, दिल्ली, बैंगलुरु और पुणे में एक नया कॉन्सेप्ट निकला है। लोग रैंडमली सोशल मीडिया पर लोगों को अपने घर पर लंच या डिनर के लिए इनवाइट करते हैं। लोग इस तरह अब मेहमानों को अपने घर पर बुला रहे हैं। ताकि वो फील कर सकें और अपने बच्चों को बता सकें। जब बहुत लोग साथ मिलकर खाना खाते हैं तो खाने का स्वाद नहीं, साथ का अहसास अहम होता है।
अब बारात का क्या होगा
आज भी छोटे शहरों में आपस में रिश्तेदारी में छोटी-मोटी रूठा-मनाईयां इस बात पर ही हो जाती हैं कि बारात की बस में कौन बैठकर जाएगा और कौन नहीं। लेकिन हम मेट्रो शहरों के इन अकेले लोगों की बात करें तो शायद बारात की बस को भरना इन लोगों के लिए चैलेंज होगा। मौसी, मामी, बुआ, काकी जैसे रिश्तेदार तब तो ठीक हैं लेकिन शादी में भीड़ को दिखाने के लिए अब लोगों को 500 रुपए देकर बुलाना होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि बच्चों को पता ही नहीं होगा कि बारात की बस में जाने का क्या अनुभव होता है। जिस तरह से आज लंच पर बुलाया जा रहा है उसी तरह से कल लोगों को बारात में जाने के लिए बुलाया जाएगा।
अभी देर नहीं हुई
यह सच है कि आज अगर हम किसी से मिलना नहीं चाहते तो कल कोई भी हमसे मिलना नहीं चाहेगा। समय के अनुसार खुद को बदलना चाहिए। आज वो ज़माना नहीं रहा कि पहले की तरह से पंद्रह दिन पहले कोई आकर घर में बैठ जाए। लेकिन हां, खुशी और ग़म के मौके पर अपनी रिश्तेदारी निभाना तो मनुष्य होने के नाते हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारी है। आप चाहें कितने भी दोस्तों से दोस्ती कर लीजिए लेकिन ज़िंदगी के किसी न किसी मोड़ पर आपको अहसास ज़रूर होता है कि रिश्तों की ज़िंदगी में अपनी एक अहमियत है और उसका कोई सानी नहीं।



