घर... वो जगह, जहां इस बड़ी-सी दुनिया में हमारी एक छोटी-सी दुनिया बसती है। जहां लौटने पर सुकून मिलता है। हर कोई अपनी हैसियत के अनुसार अपने घर को सजाता और संवारता है। यहां रहने वाले सभी लोग प्रेम की एक डोरी से बंधे होते हैं। लेकिन वक्त बदला और वक्त के साथ घर में रहने वालों की तादाद भी कम होती चली गई। पहले एक ही घर में 20 से 30 लोग आराम से रहा करते थे। लेकिन अब परिवार के नाम पर पति-पत्नी, बच्चे और बहुत हुआ तो बुजुर्ग माता-पिता। कई जगहों पर तो हालात ऐसे बन जाते हैं कि बुजुर्ग माता-पिता बदलते माहौल और नई जीवनशैली को देखते हुए खुद ही अलग रहना बेहतर समझने लगते हैं।
और बाबूजी नहीं रहे
अभी हाल ही की घटना देख लीजिए। जयपुर में एक 90 वर्षीय बुजुर्ग काफी समय से अपने घर में अकेले रह रहे थे। वे एक सेवानिवृत्त प्रिंसिपल थे। ऐसा नहीं था कि उनके बच्चे विदेश में रहते थे। उनका बेटा भी उसी शहर में रहता था। लेकिन उनकी मृत्यु जिस परिस्थिति में हुई, वह सचमुच दिल को बेचैन कर देने वाली है।
वे तीन दिन तक अपने फ्लैट से बाहर नहीं निकले। जब पड़ोसियों को फ्लैट से दुर्गंध आने लगी तो उन्होंने ताला तुड़वाकर अंदर देखा। वहां बुजुर्ग बाथरूम के पास गिरे हुए मिले। उनके सिर पर चोट के निशान थे और उनकी मौत हो चुकी थी। सूचना मिलने पर बेटा और बेटियां पहुंचे और उनका अंतिम संस्कार किया गया।
ये कहानी तो खत्म हो गई, लेकिन...
हम मान सकते हैं कि परिवार के रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे होंगे। आज के दौर में रिश्तों में पहले जैसी गर्माहट भी कम हो गई है। लेकिन क्या सचमुच हालात इतने बदल गए हैं कि कोई बुजुर्ग अकेले घर में दम तोड़ दे और उसके बच्चों को कई दिनों तक इसकी खबर भी न हो?
अक्सर लोगों को कहते सुना है—"अरे, कोई सुध लेने वाला ही नहीं है।" अब यह बात सिर्फ कहावत नहीं रही, बल्कि हकीकत बनती जा रही है। हम यह नहीं कह रहे कि अगर कोई साथ होता तो बुजुर्ग बच जाते। जिसे जाना होता है, उसे अस्पताल का बिस्तर भी नहीं रोक पाता। लेकिन किसी अपने का साथ आखिरी समय तक होना भी कम मायने नहीं रखता।
आप सेवा कर सकते हैं
माना कि आज का दौर पहले जैसा नहीं रहा। लोगों में सहनशीलता भी कम हुई है। लेकिन एक बात हमेशा याद रखिए मानवता की सबसे बड़ी पूजा सेवा है। अगर साथ नहीं रह सकते तो क्या फोन पर हालचाल भी नहीं पूछ सकते? क्या सप्ताह में एक-दो बार मिलने जाना इतना मुश्किल हो गया है?
बचपन को याद कीजिए। वही भाई-बहन, जिनके बिना एक दिन भी अधूरा लगता था। वही लोग, जिनके साथ हंसी, लड़ाई और प्यार में पूरी दुनिया बसती थी। आज उन्हीं से बात किए महीनों और कभी-कभी सालों गुजर जाते हैं।
ईंट-पत्थर से बड़े होते हैं रिश्ते
बड़े होने के बाद अक्सर संपत्ति, अहंकार और छोटे-छोटे विवाद हमारे बीच दीवारें खड़ी कर देते हैं। मकान, दुकान और जमीन फिर से बन सकती है, लेकिन टूटे हुए रिश्ते अक्सर दोबारा नहीं जुड़ते। अगर रिश्तों को बचाना है तो कभी-कभी झुकना भी पड़ता है। माफ करना भी पड़ता है और सामने वाले की कमियों को स्वीकार भी करना पड़ता है।
कर्मों का हिसाब देना होगा
याद रखिए, जो हम आज बोएंगे, कल वही काटेंगे। जवानी हमेशा साथ नहीं रहती। एक दिन हम भी उसी उम्र में पहुंचेंगे, जहां आज हमारे माता-पिता या बुजुर्ग खड़े हैं। इसलिए ऐसा कोई काम मत कीजिए कि कल खुद से नजरें मिलाना मुश्किल हो जाए। रिश्तों को समय दीजिए, अपनों का हाल पूछिए और अपने घरों को सिर्फ ईंट-पत्थर का मकान बनने से बचाइए।
अभी भी वक्त है... संभलने का, समझने का और रिश्तों को फिर से जीने का।



