आप करती क्या हैं?
कुछ नहीं, एक हाउसवाइफ हूं।
बरसों से घर संभाल रही महिलाओं की कंडीशनिंग ही कुछ ऐसी हो गई है कि इस सवाल के जवाब में वे अक्सर यही कहती हैं। यहां तक कि अपना परिचय भी कुछ इसी अंदाज में देती हैं। हां, घर में रहने वाली जो महिलाएं अपने काम और अपनी पहचान को लेकर जागरूक हैं, वे अब खुद को होममेकर कहती हैं और समझती भी हैं। लेकिन ऐसी महिलाओं की संख्या अभी भी बहुत ज्यादा नहीं है।
असलियत यह है कि महिला चाहे हाउसवाइफ हो या वर्किंग, वह किसी न किसी रूप में होममेकर जरूर होती है। यानी मकान को घर बनाने वाली। सीमित बजट में घर को सजाने-संवारने वाली। इस बड़ी सी दुनिया में अपने छोटे से घर को अपना संसार मानकर उसे संवारने वाली।
सच है, आसान नहीं होता घर पर रहना
आपको क्या लगता है कि घर पर रहना आसान होता है? नहीं, सच में नहीं होता। हर इंसान बाहर निकलकर अपनी एक पहचान बनाना चाहता है। आज के संदर्भ में देखें तो पिछले दो दशकों में जो महिलाएं नौकरी नहीं कर रही हैं और घर पर रहकर परिवार संभाल रही हैं, उनमें से बहुत सी महिलाएं ऐसा अपनी पसंद और परिस्थितियों के कारण कर रही हैं। उनके पास बाहर जाकर काम करने का विकल्प है। उनके माता-पिता ने उन्हें इतना सक्षम बनाया है कि वे अपने साथी के बराबर कमाएं या न कमाएं, लेकिन कम से कम अपना खर्च उठाने भर का तो कमा ही सकती हैं।
लेकिन अगर इसके बावजूद उन्होंने घर पर रहकर अपने परिवार और घर को प्राथमिकता दी है, तो क्या हम उनके इस फैसले और उनके काम की अहमियत को समझते हैं? जरा उस इंसान के बारे में सोचिए जो हर वक्त घर में मौजूद रहता है, सबकी जरूरतों का ख्याल रखता है, बच्चों की परवरिश से लेकर घर की छोटी-बड़ी जिम्मेदारियां निभाता है। यह करना आसान नहीं है।
दुबई के प्रिंस ने कुछ अलग ही कर दिया
मार्च 2026 में दुबई के क्राउन प्रिंस शेख हमदान बिन मोहम्मद बिन राशिद के नाम से जुड़ी एक पहल ने इस बहस को एक नया नजरिया दिया। आधिकारिक दस्तावेजों और सरकारी रिकॉर्ड में ‘हाउसवाइफ’ की जगह ‘जेनरेशन शेपर’ या ‘मेकर ऑफ जनरेशंस’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल की बात सामने आई।
इस पहल का संदेश बेहद महत्वपूर्ण है। घर और बच्चों की जिम्मेदारी संभालने वाली महिला केवल घर का काम नहीं कर रही होती, वह आने वाली पीढ़ी को आकार देने में भी भूमिका निभा रही होती है।
वह बच्चों की परवरिश करती है, उनके संस्कारों और सोच को प्रभावित करती है, परिवार के भावनात्मक संतुलन को संभालती है और घर को वह जगह बनाती है जहां से एक नई पीढ़ी दुनिया को समझना शुरू करती है। ऐसे में उसे केवल ‘हाउसवाइफ’ कहकर उसके काम को सीमित कर देना क्या सही है?
आप सोचिए और बोलिए
आपने कभी महसूस किया होगा कि महिलाओं की जिंदगी में एक अजीब-सी कशमकश हमेशा चलती रहती है। उन्हें लगातार जज किया जाता है। अगर वे कामकाजी हैं तो हम आंकते हैं कि वे घर और बाहर को कैसे मैनेज करती हैं। क्या वे बच्चों को वह परवरिश दे पा रही हैं जिसकी उन्हें जरूरत है? क्या वे परिवार के लिए पर्याप्त समय निकाल पा रही हैं? और अगर वे घर पर रहती हैं तो हम जैसे चार लोग यह आंकलन करने लगते हैं कि आखिर दिन भर में वे ऐसा कौन-सा काम करती हैं? क्योंकि घर पर तो काम ही नहीं होते! यानी सीधी-सच्ची बात यह है कि हम एक महिला को चैन से जीने ही नहीं देते।
हमें अपने आसपास मौजूद महिलाओं को देखना चाहिए। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमने ही उनके अंदर, न चाहते हुए भी, एक अजीब-सी बेचैनी और कशमकश भर दी है? उन्हें यह अहसास दिला दिया है कि वे जो कर रही हैं, वह बहुत कम है। उन्हें और बहुत कुछ करना चाहिए था, लेकिन वे तो कुछ करती ही नहीं।
अगर आप भी ऐसा कर रहे हैं तो आज से ही यह करना बंद कर दीजिए। किसी की जिंदगी की बेचैनी की वजह मत बनिए, उसकी मुस्कुराहट का सबब बनिए। अगर हम वाकई इस दुनिया में थोड़ा सुकून चाहते हैं तो जजमेंटल होना बंद करना होगा। महिलाओं और उनके काम का आंकलन करना बंद करना होगा।
इस बात को स्वीकार करने में कोई अतिशयोक्ति नहीं होनी चाहिए कि महिला चाहे होममेकर हो या कामकाजी, वह किसी न किसी रूप में जेनरेशन मेकर होती है।
उसे जिंदगी ने वाकई एक बेहद चुनौतीपूर्ण भूमिका दी है। उसके काम को सम्मान दीजिए, क्योंकि जब हम एक महिला के काम और चुनाव का सम्मान करते हैं तो उसका फायदा सिर्फ उस महिला को नहीं, पूरे समाज को होता है।
इस तरह के और लेख पढ़ने के लिए हमारी केटेगरी "अपना ज्ञान" पर क्लिक करें।



