इंटरनेट और तकनीक की दुनिया ने जहां लोगों की जिंदगी को आसान बनाया है वहीं एक कर्मचारी के तौर पर इसके क्या दुष्प्रभाव होते हैं वो भी किसी से छिपे हुए नहीं हैं। कॉरपोरेट मजदूर अक्सर ऑफिस से लौटने के बाद भी कई बार ऑनलाइन ऑफिस में मौजूद होते हैं। उन्हें ईमेल के रिप्लाई करने होते हैं, न कॉल्स उठाने होते हैं, तो कई बार वो गूगल मीटिंग भी अटेंड कर रहे होते हैं। लेकिन लोकसभा के शीतकालीन सत्र में इस बार एक ऐसा बिल पेश किया गया जिसकी चर्चा इस समय पूरे हिंदुस्तान में हो रही है। यह बिल राइट टू रिजेक्ट है। इसके तहत कर्मचारी ऑफिस आवर्स के बाद या अपनी छुट्टी पर ऑफिस के कॉल न उठाने या काम करने के लिए बाध्य नहीं होगा।
लोकसभा में एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने एक प्राइवेट मेंबर बिल राइट टू डिस्कनेक्ट बिल 2025 पेश किया। इस बिल में प्रस्ताव है कि कर्मचारियों को ऑफिस के समय के बाद ऑफिशियल कम्युनिकेशन सुनने के लिए मजबूर न किया जाए।
तो क्या है खासियत
राइट टू रिजेक्ट बिल में प्रावधान है कि किसी भी नॉन-कम्प्लायंस के लिए एंटिटीज़ (कंपनियों या सोसाइटीज़) पर उनके एम्प्लॉइज़ की टोटल सैलरी का 1 प्रतिशत जुर्माना लगाया जाना चाहिए। यह बिल हर एम्प्लॉई को काम से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक कम्युनिकेशन से डिस्कनेक्ट करने का अधिकार देता है। इसका सीधा सा अर्थ है कि कर्मचारी को ऑफिस टाइम के बाद बॉस के फोन या ईमेल से मुक्त रहने का अधिकार होगा। अगर हम सिंपल भाषा में बात करें तो कर्मचारी ऑफिस टाइम के बाद बॉस के फोन या ईमेल का जवाब देने से कानूनी रूप से फ्री हो जाएंगे।
एक्स पर लिखा
इस बिल के संदर्भ में एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले ने लिखा है कि इस बिल को लाने का मकसद एक अच्छी और हेल्दी वर्क-लाइफ बैलेंस को बढ़ावा देना है। बहुत से कर्मचारी इस डिजिटल कल्चर की वजह से बर्नआउट का शिकार हो रहे हैं। इस बिल से उनका वर्क-लाइफ बैलेंस बेहतर होगा। सुले ने इस बिल को पेश करते समय तर्क दिया कि तकनीक काम करने की फ्लैक्सिबिलिटी देती है लेकिन प्रोफेशनल और पर्सनल लाइफ का बैलेंस इससे डगमगाता है।
तो क्या यह पारित होगा
यह वो बिल है जो बहुत लोगों की जिंदगी से जुड़ा है। शायद यही वजह है कि इस बिल की चर्चा वो लोग भी कर रहे हैं जो राजनीति और संसद के बारे में ज्यादा कुछ जानना और समझना भी नहीं चाहते। फिलहाल तो यह बिल पेश किया गया है और यह पारित होता है या नहीं, यह बहुत बाद की बात है। लेकिन उम्मीद यही है कि यह बिल एक निजी सदस्य का बिल है, जिसका अर्थ है कि इसे एक ऐसे संसद सदस्य द्वारा पेश किया गया है जो मंत्री नहीं है। भारत में निजी सदस्य के बिल शायद ही कभी कानून बनते हैं ज्यादातर पर या तो बहस होती है और उन्हें वापस ले लिया जाता है या सरकार के जवाब के बाद आगे नहीं बढ़ाया जाता। लेकिन इस बिल ने कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य और डिजिटल ओवरवर्क के बारे में एक महत्वपूर्ण चर्चा को फिर से शुरू कर दिया है।
कौन हैं सुप्रिया सुले
सुप्रिया एक संसद सदस्य हैं। यह राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी के संस्थापक शरद पवार की बेटी हैं। यह वर्तमान में 2009 से बारामती का प्रतिनिधित्व करने वाली लोकसभा की सदस्य हैं। अपने संसदीय कर्तव्यों में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए इन्हें साल 2025 में सांसद रत्न पुरस्कार से सम्मानित भी किया जा चुका है। इससे पहले यह संसद में महाराष्ट्र की राज्यसभा की सदस्य थीं। यह अपने सामाजिक हित के कार्यों के लिए जानी जाती हैं।
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