क्या वाकई हर जमाना अपने आप में बेस्ट होता है?

क्या वाकई हर जमाना अपने आप में बेस्ट होता है?

हम हमेशा सुनते आए हैं अपने मां-बाप से, अपने दादा-दादी से उनके जमाने के किस्से। हमारे दादा जी के जमाने में तो गांव में बिजली भी नहीं होती थी। वो नदी पार करके स्कूल जाया करते थे। उनका स्कूल और कॉलेज उनके गांव में नहीं था। वहीं पापा के पास अपनी साइकिल और लूना के मस्तीभरे दिनों की एक लंबी फेहरिस्त हुआ करती थी। हमारे पापा और मां बताते हैं कि कैसे उनके जमाने में वो लोग लैंडलाइन फोन और लेटर लिखकर अपने रिश्तेदारों से जुड़े रहते थे। वहीं अगर हम अपने जमाने में सुविधाओं के नाम पर बहुत कुछ है। संघर्ष और चुनौतियों की कोई दास्तां हमारे पास नहीं है, लेकिन किस्से बहुत रोचक हैं। अगर जमाने के इस पैटर्न को देखें तो समझ पाएंगे कि हर इंसान को वही जमाना और पैटर्न अच्छा लगता है, जिसमें वो खुद रहा हो।

वो 90 का दौर

अब हम बात करते हैं हमारी पीढ़ी के लोगों की, जो कि 90 के दशक की है। हम वो पीढ़ी हैं जिसके सामने मोबाइल ने जन्म लिया है और सोशल मीडिया का जन्म भी हमारे ही सामने हुआ है। फेसबुक से पहले ऑरकुट का जमाना भी हमने देखा है। हमें लगता है कि 90 के दशक के गाने, उस जमाने के लोगों की सोच, सभी कुछ परफेक्ट था। लेकिन अगर जेन ज़ी से पूछें तो वो हमारे जमाने के लोगों की बहुत सी कमियां हमें बताने में कोई गुरेज नहीं करेंगे।

अब बात यह है कि सवाल आया क्यों

अब भई आपको लग रहा होगा कि इस वक्त यह बात छेड़ने का क्या मतलब है। तो हुआ यह कि मुझे हमेशा एक इंसान के तौर पर कन्फ्यूजन रहता था कि भाई आखिर कौन सा जमाना अच्छा है। तो इस सवाल का जवाब मुझे मिल चुका है। और मुझे लगता है कि यह वो जवाब है, जिसे जानने की सभी को उत्सुकता होगी ही। असल में हाल ही में हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल में जावेद अख्तर प्रमुख वक्ता के तौर पर मौजूद थे। जब उनसे ऑडियंस में किसी ने सवाल पूछा कि जावेद साहब आप बताएं कि कौन सा जमाना अच्छा था, तो उनका कहना था कि आपको बता दूं कि अरस्तु के जमाने से यह बात चली आ रही है कि हमारे जमाने की बात ही अलग थी। इसलिए आपको बता दूं कि जमाना कभी खराब नहीं होता। बस आप जिस जमाने में अपना कॉलेज और स्कूल खत्म करते हो, आप उस जमाने की यादों को अपने अंदर बसा लेते हो। और सारी जिंदगी आपको वो अच्छा लगता है। यानी कि जमाना हर इंसान के लिए वो आइडियल होता है, जिसमें उसकी जवानी और उसका बचपन बीतता है।

हर दौर को जी लीजिए

एक इंसान के तौर पर हम अपनी जिंदगी में बहुत से दौरों को गुजरता हुआ देखते हैं। वक्त चलता ही रहता है, यह बात हम समझ चुके हैं। बस अगर हम खुद को खुश देखना चाहते हैं तो हम अपने अंदर बदलाव का माद्दा भी डेवलप करें। अपने जमाने की बातों को याद करना बहुत अच्छी बात है, लेकिन अगर कुछ बदलाव अच्छे के लिए हो रहे हैं तो उन्हें भी स्वीकार करना आपकी खुली मानसिकता की निशानी होगी। उदाहरण के लिए पहले हमारे घरों में आंगन हुआ करते थे। फिर वक्त बदला तो आंगन और बागीचे वाले घर गायब हो गए। उनकी जगह हमारे छोटे-छोटे घरों ने ले ली। और अब जगह कम हो गई है तो फ्लैट्स आ चुके हैं। अपनी स्वीकार्यता परिस्थिति के अनुसार बदलें।

ज़माना हमसे है

हां, आप खुद भी खुश रहिए और दूसरों को भी खुश रहने दीजिए। आपने देखा होगा कुछ लोग हर पीढ़ी के साथ एडजस्ट हो जाते हैं। यानी कि वो हर ज़माने के होते हैं। उनकी उपस्थिति महफिल में जान डाल देती है। वहीं कुछ लोग ऐसे होते हैं जो वर्तमान को समझ नहीं पाते। वो अपने पुराने ज़माने को हमेशा याद करते रहते हैं और भीड़ में कहीं तन्हा से हो जाते हैं। लेकिन खुश रहने का विकल्प हमेशा अपने जीवन में रखिए। और ऊर्जा से भरकर खुद से कह दीजिए कि ज़माना हमसे है, हम जमाने से नहीं। ज़िन्दगी आपको एक ही बार मिली है। खूब हंसिए, मुस्कुराइए। क्या पता कल हो ना हो।

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