पहले एक दौर था, जब लड़कियों की शादी के साथ ही उनकी सखियाँ भी छूट जाया करती थीं। और फिर ज़िंदगी भर ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबी लड़कियाँ जब भी फ़ुरसत पातीं, तो उन सखियों को याद करके दो पल हँस लिया करती थीं। कभी उनकी बातों में वो स्कूल में अचार के साथ नमकीन का पराँठा लाने वाली मीना का ज़िक्र होता, तो कभी वो बतातीं कि कैसे गणित के सवालों को चुटकियों में काजल हल कर दिया करती थी। ये वो औरतें थीं, जो पुरानी यादों के साथ अपनी उम्र गुज़ार देती थीं। वो शादी के बाद ज़िम्मेदारियों में इतनी गुम हो जाती थीं कि उनकी सखियाँ, उनका लड़कपन, बचपन और हँसी-ठिठोली कहीं छूट-सी जाती थी।
फिर आई तकनीक!
लेकिन वो कहते हैं न कि तकनीक बहुत अच्छी चीज़ होती है। तकनीक आई और तकनीक के साथ आई उम्मीद भी। वो सखियाँ, जो यादों में सिमट गई थीं, उन्हें अपने बच्चों की मदद से इन महिलाओं ने सोशल मीडिया पर ढूँढा। 90 के दशक की पीढ़ी ने यह काम बहुत किया है। उन्होंने तकनीक के साथ अपने माँ-बाप की दोस्ती कराई। खैर, कुछ दोस्त इन महिलाओं को मिले। सोशल मीडिया पर मिलने के बाद मोबाइल नंबर की अदला-बदली भी शुरू हुई। इसके बाद शुरू हुआ दोस्ती और परिवर्तन का नया अध्याय। आज ऐसी बहुत-सी महिलाएँ अपनी सखियों से भले ही मिल न पाती हों, लेकिन फ़ोन पर तो कभी-कभार बात हो ही जाती है।
अब वो सेलिब्रेट करती हैं!
अब हम बात करते हैं 90 के दशक की पीढ़ी की। इस दौर की लड़कियों ने भले ही अपने शहर और मोहल्ले को छोड़ा, लेकिन अपने मोबाइल में वो अपनी पुरानी सहेलियों के सारे नंबर लेकर आई थीं, जिनके साथ बचपन से नाता रहा। इन महिलाओं के पास अपने स्कूल और कॉलेज की सखियों का एक वॉट्सऐप ग्रुप है, जहाँ वो भले ही रोज़ बात न कर पाती हों, लेकिन कौन कहाँ है, किसकी ज़िंदगी में क्या चल रहा है—इस बात पर वो अपडेट रहती हैं। वो पिछली पीढ़ी से थोड़ी समझदार थीं शायद, या उनके हिस्से में आज़ादी थोड़ी ज़्यादा आई थी कि नए रिश्ते जोड़ने के लिए उन्हें अपने पुराने बंधन तोड़ने नहीं पड़े। 90 के दशक की ये लड़कियाँ अपनी पुरानी सहेलियों के साथ खुशियों के हिचकोले खाती हैं; वो मुस्कुराती हैं, सेलिब्रेट करती हैं।
इन सज्जन को दिक्कत क्या है भाई?
अपनी माँ को या अपनी पत्नी को किसी के साथ (खुश) देखना शायद कुछ लोगों के लिए नया हो सकता है, लेकिन अब इस समाज को बदलाव स्वीकार करना होगा। अब सिर्फ़ पुरुषों के 'जिगरी' नहीं हैं, महिलाओं के पास भी अपनी सहेलियाँ हैं। वो अपने कॉलेज की रियूनियन पार्टी में भी जाती हैं, यहाँ तक कि फ्रेंडशिप डे भी सेलिब्रेट करती नज़र आती हैं। लेकिन समाज के ये चार लोग यहाँ पर भी पीछा नहीं छोड़ते! चालीस की उम्र के बाद अगर कोई महिला अपनी सहेलियों के साथ कोई फ़ोटो डालती है या चुहलबाज़ी करते हुए कोई रील डालती है, तो आपको क्या दिक्कत है? क्या यह कहीं लिखा है कि केवल स्कूल और कॉलेज के बच्चे ही फ्रेंडशिप डे सेलिब्रेट कर सकते हैं? और शादीशुदा घरेलू महिलाओं को केवल इस दिन बैठकर अपनी सहेलियों को याद करना चाहिए और सोचना चाहिए कि "अरे, मेरे स्कूल के दिन कितने अच्छे थे, हम ऐसा करते थे, वैसा करते थे"? क्यों? अगर वह वर्तमान में कुछ सेलिब्रेट कर रही हैं, अपने दोस्तों के साथ अपना 'मी टाइम' (Me Time) एंजॉय कर रही हैं, तो इसमें किसी को भी क्या परेशानी होनी चाहिए?
पुरुषों के पास हमेशा दोस्त रहते हैं, वो कभी-न-कभी अपने दोस्तों से मिलते ही हैं; तो फिर महिलाओं के दोस्तों के ग्रुप का होना आँख की किरकिरी क्यों? वक़्त बदल गया है जनाब, आप भी अपनी सोच का चश्मा ज़रा बदल दीजिए, कहीं ऐसा न हो कि आप आउटडेटेड हो जाएँ।
ख़ैर, अब फ्रेंडशिप डे तो बीत चुका है। ऐसे में आप भी अपनी बीती हुई पुरानी सोच को निकाल दीजिए। शादी के बाद जो महिला केवल बहू, माँ, पत्नी, भाभी या चाची जैसे रिश्तों में बँधकर रह जाती है, उसे जब आप एक सहेली के तौर पर देखेंगे, तो समझ पाएँगे कि उसकी ज़िंदगी में खुशियों के और खिलखिलाने के क्या मायने हैं। वो भी कैसे बिना वजह कहकहा लगा सकती है! आप समझ पाएँगे कि उसका सेंस ऑफ़ ह्यूमर किस लेवल का है। आप यह भी जान पाएँगे कि ज़िम्मेदारियों का चोला उतारकर जब वो सहेली बनती है, तो उससे नटखट कोई नहीं होता। तो बन लेने दीजिए एक महिला को सहेली भी! अगर एक महिला के पास एक सहेली होती है, तो समझ जाइए कि उसके पास खुशियों की चाबी होती है।



