असरानी साहब आपको हमेशा याद किया जाएगा कि आप अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं

असरानी साहब आपको हमेशा याद किया जाएगा कि आप अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं

इस दुनिया का दस्तूर है कि जो आया है उसे जाना ही होगा। कौन कब जाएगा कब आएगा यह सिर्फ ऊपर वाले को ही पता है। दिवाली के दिन जब भारत अपने उत्सवी रंग में रंगा था तब पता चला कि असरानी ने अपना विदाई गीत गा लिया है। हालांकि अपने इंस्टाग्राम पर अपने जाने से कुछ समय पहले ही दिवाली की शुभकामना भी सभी को दे दी। ऐसे में मात्र एक घंटे बाद उनके निधन की सूचना ने उनके फ़ैंस को हैरान कर दिया। हालांकि वो पिछले पांच दिनों से अस्पताल में एडमिट थे। उनकी इच्छा के मुताबिक उनका अंतिम संस्कार भी बहुत प्राइवेट और शांति से कर दिया गया है। ऐसा उनके मैनेजर ने बताया है। किसी का भी जाना हमें अच्छा नहीं लगता। लेकिन नियति है... क्या कर सकते हैं। जब असरानी ने विदाई गीत गा ही लिया है तो आज उनकी ज़िंदगी के कुछ पन्नों को पलट कर देखते हैं।

जयपुर और गजक

उनकी कर्मभूमि भले ही मुंबई थी लेकिन राजस्थान की राजधानी जयपुर वो शहर था जहां उनके सपनों को पंख मिले थे। विभाजन के वक्त उनके पिता पाकिस्तान से जयपुर आ गए थे। यहीं पर आकर उन्होंने कारपेट की दुकान खोली थी। असरानी ने सेंट जेवियर स्कूल से स्कूलिंग और राजस्थान कॉलेज से बीए किया। वो वॉयस ओवर आर्टिस्ट के तौर पर ऑल इंडिया रेडियो से जुड़े। एक्टिंग ट्राई की और फिर मुंबई का रुख किया। जयपुर में वो सिंधी कॉलोनी में रहते थे। जयपुर से उन्हें प्यार था। अपने पिता से मिलने वो बहुत बार जयपुर आते थे। यहां की गजक भी उन्हें पसंद थी।

आसान कुछ नहीं होता

आपको लग रहा होगा कि असरानी ने जिस वक्त में एक्टिंग के बारे में सोचा होगा उस वक्त कंपटीशन चूंकि कम था तो आसान रही होगी उनकी एक्टिंग। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं था। वो जब जयपुर से मुंबई गए थे तो एक महीने में वापिस लौट आए थे। वो नौशाद से मिलना चाहते थे लेकिन बात नहीं बनी। उनके पिता ने कहा कि वो उनका बिज़नेस संभालें लेकिन उन्हें यह मंज़ूर नहीं था। इसके बाद दोबारा तैयारी शुरू की। एफटीआई पुणे में एडमिशन लिया और अपने सपनों की मंज़िल की तरफ पहला क़दम बढ़ाया। कोर्स करने के बाद भी उन्हें फ़िल्मों में काम यूं ही नहीं मिल गया। लेकिन कहते हैं ना मेहनत करने वालों की कभी हार नहीं होती। उन्हें 1966 में फ़िल्म हरे कांच की चूड़ियां में मौका मिला।

अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर

पांच दशक तक फ़िल्मों में काम करने के दौरान उन्होंने बहुत से किरदार निभाए। लेकिन शोले का वो डायलॉग "हम अंग्रेज़ों के ज़माने के जेलर हैं" एक्टर के तौर पर उन्हें स्थापित कर गया। यह डायलॉग और इसकी अदायगी का अंदाज़ उनकी पहचान बन गया। बहुत से इंटरव्यू में वो इस बात का ज़िक्र कर चुके थे। वहीं ऋषिकेश मुखर्जी की फ़िल्म बावर्ची में भी उनके रोल को कोई नहीं भूल सकता। इस रोल को करने के बाद वो ऋषिकेश मुखर्जी की आने वाली बहुत सी फ़िल्मों का हिस्सा बन गए।

वो कुछ हटकर थे

अगर हम उनके एक एक्टर के तौर पर ज़िंदगी की बात करें तो वह एक वर्सेटाइल एक्टर थे। वो बहुत सी वेब सीरीज़ में भी काम कर चुके थे। और काम को हासिल करने के लिए उनके जुनून को आप नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। अगर हम कॉमेडी की बात करें तो वो सिखा गए कि अगर आप चाहें तो बिना फूहड़पन के भी कॉमेडी कर सकते हैं। उनका ह्यूमर भाव-भंगिमाओं के साथ था। वो अपनी ज़िंदगी में एक्टिंग को जीते थे।

और वो एक्शन

उनके निधन के बाद बहुत से लोग सोशल मीडिया पर संवेदनाएं प्रकट कर रहे हैं। इसमें राजस्थान की उपमुख्यमंत्री दिया कुमारी, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत शामिल हैं। लेकिन बोमन ईरानी का संवेदना संदेश भी बताता है कि 84 साल की उम्र में भी असरानी के अंदर एक एक्टर के तौर पर कितना स्पार्क बाकी था। अपने सोशल मीडिया पर वो ज़िक्र करते हैं कि दस दिन पहले एक शूटिंग के दौरान मैं उनसे मिला था। लेकिन एक्शन और कट के बीच में क्या होता है यह उन्हें देखकर समझ आया। शॉट के लिए, मुझे घायल होकर ज़मीन पर गिरना था। उन्हें, यानी डॉक्टर को, दौड़कर मेरी मदद करनी पड़ी। हालांकि उन्हें भीड़-भाड़ वाले सेट पर अंधेरे में चलते हुए थोड़ी मदद की ज़रूरत थी, लेकिन उनके लिए जादुई शब्द "एक्शन" का एक और ही मतलब था।

किसी तार की तरह, वे कमरे में दौड़े और सहज ही हाथों और घुटनों के बल ज़मीन पर बैठ गए और मुझे देखने लगे। जैसे ही उनके कानों में शब्द पड़ा "कट", उन्हें ज़मीन से उठने के लिए थोड़ी मदद की ज़रूरत थी। लेकिन रोलिंग कैमरा के लिए उनका कमिटमेंट हमेशा मेरे साथ रहेगा। उनके अंदर एनर्जी का एक ऐसा फ्लो था जो उन्हें खुश, लाइव और एक्साइटेड रखता था। आखिर तक, दुनिया में उनके लिए एक्टिंग के अलावा कुछ करने लायक नहीं था। वे अपनी आने वाली दुनिया में "एक्शन" का जवाब देने और वही करने के अलावा कुछ नहीं करेंगे जिससे उन्हें और दूसरों को खुशी मिले।

तो चलिए असरानी साहब अलविदा, आने वाली पीढ़ी जो बॉलीवुड की क्लासिक फ़िल्मों की शौकीन होगी, उसे भी याद रहेगा कि अंग्रेज़ों के ज़माने का एक ही जेलर था और वो थे असरानी।

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