हम सभी लोग अपनी जिंदगी में अपने बचपन को याद करके हंसते हैं, मुस्कुराते हैं। हम सब लोग जो बहुत बड़े हो चुके हैं, अपनी जिंदगी का सबसे खूबसूरत दौर वही बचपन वाला ही लगता है। हमारे वो बहन-भाई, जिनके साथ कभी हमारी बहुत दुश्मनियां हुआ करती थीं, आज वो हमें बहुत प्यारे हैं। लेकिन इस चिल्ड्रन्स डे पर इस बार खुद से वादा करें कि आप न सिर्फ उस बचपन को याद करके हंसेंगे-मुस्कुराएंगे, बल्कि अपनी इस जिंदगी में वो कुछ बदलाव करेंगे जिससे कि आपकी पूरी जिंदगी आपके बचपन की तरह खुशनुमा हो जाए।
वो भूलने वाली फितरत
ऐसा नहीं था कि जब हम छोटे थे तो हमारी जिंदगी में सिर्फ प्यार था। हम अपने आसपास के लोगों से रूठते थे, मनते भी और मनाते भी थे। यहां तक कि कई बार हम अपने कजिंस के साथ ग्रुपबाज़ी भी करते थे। लेकिन हम सभी में भूलने की फितरत और माफ कर देने की फितरत भी हुआ करती थी। यह कोई बचपन की या हल्के में लेने की बात नहीं है। यह बात बहुत गहरी है कि अगर हम लोगों की गलतियों को भूलें, उन्हें माफ करें, तो हमारी ही जिंदगी कितनी आसान बनेगी। किसी और की नजर में हम अच्छे या बुरे बनेंगे या नहीं यह बहुत बाद की बात है, लेकिन हम कितने तनावमुक्त रहेंगे और खुश हो पाएंगे यह हम सोच भी नहीं सकते।
प्रेज़ेंट में जिएं
हम सभी लोग एक अजीब से तनाव में रहते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि जैसे हम बहुत अकेले हैं। हम दिल में बहुत से गुबार को साथ लेकर चलते हैं। अगर किसी ने कभी जिंदगी के किसी दौर में हमारे साथ बुरा किया होता है, तो वो तकलीफ हमारी जिंदगी की एक फांस बनकर हमारी खुशियों को चुभोती है और हमें अंदर ही अंदर खोखला कर देती है। आप भी ऐसा न करें। अपने बचपन से सीख लें। क्या हम अपने कजिंस के साथ दो साल पुरानी किसी बात पर नाराज़ रहते थे? जो हुआ, जब हुआ, बस उसी वक्त होकर खत्म हो जाता था। जब हम मिलते थे तब नई बातें करते थे। अब भी वैसा ही करें। अपने प्रेज़ेंट में जिएं। जिंदगी में प्रेज़ेंट के मसले भी कम नहीं हैं। लेकिन जब हम एक बोझ को अपने दिल में लेकर चलते हैं तो उम्मीद, आशाएं, खुशियां सभी खत्म हो जाती हैं।
वो छोटी-छोटी खुशियां
ऐसा नहीं है कि आपकी जिंदगी आसान होगी। जाहिर है कि इस दौड़ती-भागती जिंदगी में वक्त की कमी भी है। हम सभी लोग अपनी दिनचर्या में इतने बिज़ी हैं कि जो कुछ हमारे पास है या जिसे लेने की हमारी चाहत है, वो हमें एक्साइट नहीं करता। वो आप ही हैं जो अपने बर्थ-मंथ के आने पर एक्साइटेड हो जाते थे और अब वही आप हैं जो किसी नए कपड़े को पहनकर भी खुश नहीं हो पाते। आपने और मैंने हर चीज़ को अपनी जिंदगी में बहुत नॉर्मल बना लिया है। हम इसे मैच्योरिटी कहते हैं, लेकिन असल में यह मैच्योरिटी नहीं बल्कि जिंदगी में स्पार्क का खत्म होना है।
कुछ न कुछ सीखिए
चलिए अब आपको बचपन की एक और बात बताते हैं। हम 90 के दौर के बच्चे रबर घिसकर रबर बनाने की कोशिश करते थे। वो रबर घिसकर रबर तो कभी नहीं बना, लेकिन उसकी कोशिश हमेशा जारी रही। अगर कोई कार आई तो उसे पेंच से खोलकर देखा गया और फिर उसे वापस लगाया गया। कहने का मतलब है कि उस वक्त हमारे अंदर एक्साइटमेंट था और कुछ जानने की कोशिश जारी थी। लेकिन अब हम कुछ करना ही नहीं चाहते। कुछ नया सीखना ही नहीं चाहते। जो चल रहा है, जैसा चल रहा है, वैसा ही चलने देते हैं। लेकिन नहीं, आज हम सब लोग चिल्ड्रन्स डे पर खुद से यह वादा करें कि हम अपनी जिंदगी में अपनी बचपन वाली फितरत दोबारा लेकर आएंगे। और हमेशा खुश रहने और मुस्कुराने की कोशिश करेंगे। आखिर दिल तो बच्चा है जी।
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