यह तजुर्बा है जनाब, समझदार इतना कि हमारा बचपन इससे रूठ जाता है

यह तजुर्बा है जनाब, समझदार इतना कि हमारा बचपन इससे रूठ जाता है

तजुर्बा भी अजीबोगरीब शै है। जैसे-जैसे जिंदगी के रास्तों से गुजरते हुए यह हमारे साथ आता है, अपने पीछे बहुत कुछ छोड़ जाता है और हमसे बहुत कुछ ले भी जाता है। सबसे पहले मासूमियत जाती है, फिर बे-सबब मुस्कुराने की आदत। छोटी-छोटी खुशियों पर हैरान होना कम हो जाता है और लोगों पर यकीन करने से पहले दिल कई बार सोचता है। हम धीरे-धीरे समझने लगते हैं कि हर अपना, अपना नहीं होता और हर मुस्कुराहट के पीछे खुशी नहीं होती।

अपने साथ चांदी के तारों को भी लाता है तजुर्बा

तजुर्बा आता है तो बालों में सफेदी उतरने लगती है, माथे पर लकीरें उभर आती हैं और चेहरे के भाव ठहरने लगते हैं। मगर शायद चेहरे का यह ठहराव भीतर के एहसासों की कमी नहीं, बल्कि उन्हें संभाल लेने की हुनरमंदी होती है। अक्सर लोग जब कहते हैं, “बाल धूप में सफेद नहीं किए हैं,” तो इस बात के मायने तभी समझ आते हैं, जब तजुर्बा हमारे साथ रहने लगता है।

वाकई जिंदगी का कितना खूबसूरत पड़ाव और बदलाव है तजुर्बा।

लेकिन हैरानी की बात है कि उम्र हमें बूढ़ा नहीं करती, तजुर्बा करता है। उम्र सिर्फ साल बढ़ाती है, तजुर्बा खामोशी बढ़ाता है। मगर इसी खामोशी में इंसान जिंदगी को एक नए ढंग से पढ़ना सीखता है। फिर एक वक्त आता है, जब खुशियां ढूंढने के लिए बड़ी वजहों की जरूरत नहीं रहती। चाय की गर्म प्याली, किसी पुराने दोस्त की आवाज, बारिश की खुशबू, सुबह की धूप, घर लौटते किसी अपने का इंतजारये छोटी-छोटी चीजें फिर से मायने रखने लगती हैं।

खो जाती है कहीं मासूमियत

शायद तजुर्बे की असली खूबसूरती यही है कि वह हमसे मासूमियत तो छीन लेता है, मगर बदले में समझ दे जाता है। वह हमें सिखाता है कि खुशी हमेशा हासिल करने में नहीं होती, कभी-कभी उसे पहचान लेने में होती है।

जिंदगी में बहुत कुछ हमारे मुताबिक नहीं होता। कुछ लोग बिछड़ जाते हैं, कुछ ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं, कुछ रिश्ते अपनी मंजिल तक नहीं पहुंचते। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि जिंदगी से खुशी भी चली गई।

खुशी शायद वहीं मौजूद रहती है। बस हम उसे बड़ी चीजों के पीछे तलाशते रहते हैं।

उसकी खामोशी को महसूस करो

तजुर्बा धीरे से कहता हैअब हर खुशी का शोर मत करो, उसे महसूस करो। हर अच्छे लम्हे को दुनिया को बताना जरूरी नहीं। कुछ खुशियां सिर्फ दिल में रहने के लिए होती हैं।

और शायद उम्र के इस पड़ाव पर इंसान को यही सीखना चाहिए कि जिंदगी से शिकायतें कम और शुक्र ज्यादा किया जाए। जो मिला, उसे महसूस किया जाए; जो नहीं मिला, उसे रिहा किया जाए।

क्योंकि आखिर में जिंदगी की खूबसूरती इस बात में नहीं कि उसने हमें कितना दिया, बल्कि इस बात में है कि जो दिया, हम उसे कितनी शिद्दत से महसूस कर पाए।

यह तजुर्बा ही है, जो हमें जिंदगी को जीने का सलीका न जाने कब सिखा देता है। इसे अगर हम अपना उस्ताद कहें तो गलत न होगा। यही तो है, जो हमें आहिस्ता से खामोशी का एक चोगा पहना देता है। हम वो बहुत-सी बातें समझने और सुनने लगते हैं, जो हमसे कहीं नहीं जातीं।

जिंदगी के असली मायने गहराई में मिलते हैं और गहराइयों की दोस्ती तजुर्बे से होती है। तजुर्बे के चश्मे से जिंदगी बहुत खूबसूरत नजर आती है।

सबसे अहम बात यह है कि जब आप तजुर्बेकार हो जाते हैं, तो लोग आपको जरा गंभीरता से लेने लगते हैं। फैसले लेने में जो आप अपने लड़कपन के दिनों में जरा कन्फ्यूज रहते थे, उन्हीं हालातों को समझकर अपने लिए और अपनों के लिए फैसले लेने में हुनरमंद हो जाते हैं।

लेकिन यह तजुर्बा यूं ही जिंदगी में दाखिल नहीं होता। जिंदगी को वक्त देकर इसे हासिल किया जाता है।

सच में, बड़ा काम है यह तजुर्बा। और किस्मत वाले होते हैं वो लोग, जिन्हें तजुर्बेकार लोग मिलते हैं। ये लोग हमारी जिंदगी में फरिश्तों के मानिंद होते हैं। ये जिंदगी की मुश्किलों जैसे अंधेरे में रोशनी जलाने का हुनर रखते हैं।

बेशक तजुर्बे के आने से बचपन और लड़कपन छूट जाता है। लेकिन यह भी तो सोचिए कि इनका आना और जाना भी जिंदगी में एक तजुर्बा ही है।

सच में, बड़े कमाल का है यह तजुर्बा।

सीनियर जर्नलिस्ट अरबाज अहमद की फेसबुक वॉल से

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