‘आधुनिक भारत के मौन वास्तुकार’ डॉ. मनमोहन सिंह हमारे बीच नहीं रहे

‘आधुनिक भारत के मौन वास्तुकार’ डॉ. मनमोहन सिंह हमारे बीच नहीं रहे

26 दिसंबर, 2024 की रात 10:00 बजे एम्स दिल्ली में उन्होंने अंतिम सांस ली। सरदार मनमोहन सिंह इस देश के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री थे। वे एक प्रख्यात अर्थशास्त्री थे। सन् 1991 में, जब उन्हें वित्त मंत्रालय का भार सौंपा गया, तब उन्होंने एक कर्ज़ में डूबे हुए और दिवालिया होने की कगार पर खड़े देश को न केवल कर्ज़ से उबारा, बल्कि भारत को आर्थिक तौर पर दुनिया के पांच प्रमुख देशों में शामिल कर दिया। 1991 में उनके द्वारा पेश किया गया बजट भारत के इतिहास में आर्थिक उदारीकरण का आधार बना। उनके सुधारों ने न केवल भारत को दुनिया में एक ऊंचा मुकाम दिया, बल्कि विदेशी निवेश के लिए भारत के बाजार भी खोल दिए। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) को आसान बनाया गया। उनके ऐतिहासिक बजट भाषण में उन्होंने कहा था, “No power on earth can stop an idea which time has come.”

1991 के मध्य में भारत की आर्थिक स्थिति बेहद खराब थी। विदेशी मुद्रा भंडार अपने न्यूनतम स्तर पर था, इतना कम कि देश केवल तीन हफ्ते तक ही आयात कर सकता था। मुद्रास्फीति दर 13% को पार कर चुकी थी। राजकोषीय घाटा इतना बढ़ चुका था कि देश दिवालिया होने की कगार पर था। ऐसे समय में डॉ. मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के तौर पर आर्थिक उदारीकरण की पहल करते हुए कई बड़े सुधार लागू किए। उन्होंने भारत के इतिहास में पहली बार 47 टन सोना गिरवी रखकर 600 मिलियन डॉलर जुटाए और आईएमएफ से 2 बिलियन डॉलर का कर्ज लिया। लेकिन डॉ. सिंह जानते थे कि केवल कर्ज़ लेने से समस्या का समाधान नहीं होगा।

24 जुलाई 1991 को पेश किया गया उनका बजट भारत में आर्थिक उदारीकरण का प्रतीक बन गया। इस बजट ने लाइसेंस राज को खत्म कर दिया और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के लिए भारत के दरवाजे खोल दिए। भारतीय उद्योगों को सरकारी नियंत्रण से आजादी दी गई। उन्होंने टैक्स प्रणाली को सरल बनाया, कॉरपोरेट टैक्स बढ़ाए और अनावश्यक छूटों को कम कर दिया। अपने बजट भाषण में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था, “No power on earth can stop an idea which time has come.” इस आर्थिक उदारीकरण ने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा और देश के उद्योगों को आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ाया।

डॉ. मनमोहन सिंह के सुधारों का असर जल्द ही दिखने लगा। केवल दो साल के भीतर भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 10 बिलियन डॉलर को पार कर गया। उनके इन कदमों ने न केवल भारत को आर्थिक संकट से बाहर निकाला, बल्कि इसे वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा भी बना दिया। अर्थव्यवस्था के इस परिवर्तन ने भारत को दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल कर दिया।

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने डॉ. मनमोहन सिंह की प्रशंसा करते हुए कहा था, “When Dr Manmohan Singh speaks, the World listens.” यह टिप्पणी उनके ज्ञान, दूरदृष्टि और वैश्विक प्रतिष्ठा को दर्शाती है।

आज हम डॉ. मनमोहन सिंह को एक ऐसे दूरदर्शी अर्थशास्त्री और नेता के तौर पर याद कर रहे हैं, जिन्होंने आर्थिक उदारीकरण के जरिए भारत की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित किया और उसे वैश्विक पटल पर स्थापित किया।

अलविदा डॉ. मनमोहन सिंह।
देश आपका सदैव ऋणी रहेगा।

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