तो क्या अब हम अगले ट्विशा जैसे ही किसी केस का इंतजार कर रहे हैं?

तो क्या अब हम अगले ट्विशा जैसे ही किसी केस का इंतजार कर रहे हैं?

इन दिनों देशभर में ट्विशा का केस सुर्खियां बटोर रहा है। ट्विशा शर्मा ने ससुराल की यातनाओं से प्रताड़ित होकर अपनी जान गंवा दी। छह महीने की उसकी शादी में ना जाने क्या हुआ कि उसने मौत को गले लगाना ज्यादा सही समझा। फिलहाल उसकी सास और उसके पति जेल में हैं। हम जैसे लोग जो बहुत संवेदनशील हैं, इस घटना को लेकर कहीं ना कहीं विचलित हैं। सोशल मीडिया पर जब उसकी वेडिंग के वीडियो और फोटो आते हैं तो हम एक नजर भरकर उन्हें देखने लगते हैं। हम समझ नहीं पाते कि हम करें तो क्या... हमें डर लगता है अपने बच्चों के भविष्य को लेकर। हमें डर लगता है अपने बच्चों की शादी को लेकर।

शादी का यह उत्सव

अगर हम पिछले दस-पंद्रह सालों को देखेंगे तो हम समझ पाएंगे कि हमें किसी आंकड़े को देखने की जरूरत नहीं है। हम शादी की भव्यता का अंदाजा अपने आस-पास और जानने वालों की शादियों को देखकर ही लगा सकते हैं। अब हम जैसे मिडिल क्लास लोगों की शादियों में ही छोटे-मोटे कोरियोग्राफर आकर डांस सिखाते हैं, तो शादी में हम लोगों के ड्रेसेज ही डिजाइनर ना सही तो डिजाइनर से कम भी नहीं होते। हमारे लिए आज भी शादी का मतलब दो लोगों या परिवार का मिलना मात्र नहीं होता। हमारे लिए शादी एंजॉयमेंट और रीयूनियन का एक कॉन्सेप्ट है। खुशी का एक जरिया है शादी।

फिर यह क्या हो जाता है?

शादियों का, खुशियों का यह उत्सव तो तीन-चार दिन बाद खत्म हो जाता है। हम भी शादी से आकर बड़े खुश होते हैं। लेकिन वो खुशियां तब हवा में उड़ जाती हैं जब पता चलता है कि वो खुशियों के पिटारे वाली शादी में लड़का और लड़की ही खुश नहीं हैं। लड़का और लड़की एक-दूसरे के परिवार के साथ एडजस्ट नहीं कर पा रहे। वो दोनों इस शादी में घुटन महसूस कर रहे हैं। कई बार तो शादी के महज छह-सात महीने के अंदर ही अलगाव की नौबत आ जाती है। ऐसे में हम समझ नहीं पाते कि आखिर क्या गलती हो रही है। क्यों इतना सब होने के बाद भी लोग खुश नहीं रह पा रहे।

तो क्या शादी तोड़ दें

एक शादी के अंदर घुट-घुट कर अपनी जिंदगी को गुजार देना जीवन नहीं है। अपनी खराब शादी की वजह से अपनी जिंदगी को खत्म करने से बहुत बेहतर है कि आप अलग हो जाएं। बेटियों के मां-बाप को भी उनको यही समझाना चाहिए कि विदा होने का मतलब यह नहीं है कि अब जैसी भी जिंदगी है, गुजारनी है। हां, यह सच है कि किसी भी रिश्ते को बनने और मजबूत बनने के लिए वक्त चाहिए होता है। एडजस्ट भी करना चाहिए, लेकिन लड़के और लड़की दोनों को। समझौते के बिना पति-पत्नी क्या, कोई सा भी रिश्ता नहीं चल सकता। लेकिन अपनी बेटियों को विदा करते वक्त हमेशा बताइए कि वापसी का रास्ता उनके लिए हमेशा खुला है। और आप हर हाल में उनके साथ हैं।

पैसे का शो ऑफ नहीं

आजकल हम देखें तो शादियां पैसे का एक शो ऑफ-सी बन गई हैं। सिग्नेचर वेडिंग्स ने तो कमाल ही कर दिया है। हमारे यहां की शादियां लाखों-करोड़ों में होती हैं। हमें इस कॉन्सेप्ट को थोड़ा-सा समझने की और बदलने की जरूरत है। हम शादी में जितनी सादगी ला पाएंगे, हम रिश्ते के समीकरण को उतना ही सरल बना पाएंगे। हो सकता है कि आप समर्थ हों, आप बहुत अच्छी शादी कर सकते हैं। लेकिन आप एक सामाजिक प्राणी हैं, आप इस बात को याद रखिए कि इस तरह की शादियां एक मिडिल क्लास इंसान के लिए परेशानी का सबब बन जाती हैं। इसलिए जीवन को सरल रखिए। जब आप सरल होना सीखेंगे तो आप समझ पाएंगे कि जीवन और रिश्ते प्रेम से सींचे जाते हैं। पैसा खुशियां और सुकून नहीं ला पाता।

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