अब मौलिक अधिकार में शामिल है मासिक धर्म स्वच्छता

अब मौलिक अधिकार में शामिल है मासिक धर्म स्वच्छता

पीरियड को लेकर हमारे भारत में एक अजीब किस्म का असमंजस का माहौल रहता है। हालांकि हम सभी लोग जो एक खुली मानसिकता रखते हैं, वो मानते हैं कि महिलाओं के जीवन में पीरियड का होना बेहद नॉर्मल है। लेकिन इससे जुड़ी भ्रांतियां और दकियानूसी सोच आज भी हमारे भारत में विद्यमान है। कुछ जगहों पर पीरियड से हो रही महिलाओं को अलग कमरों में या घर के बाहरी हिस्से में रखते हैं। उनके बर्तन और बिस्तर भी अलग कर दिए जाते हैं। खैर, सोच का क्या है, वो तो शायद समय के साथ बदल ही जाएगी। लेकिन इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट का आया निर्णय महिलाओं की शिक्षा और विकास के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा। जनवरी 2026 में दिए गए निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार में शामिल कर लिया है। इसके तहत अब सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों में सैनिटरी नैपकिन मुहैया होने से लेकर बहुत सी ऐसी सुविधाएं बालिकाओं को मिलेंगी, जो उन्हें अपने अधिकारों के लिए और भी सजग बनाएंगी।

पीरियड होना सज़ा नहीं है

हम सभी जानते हैं कि पीरियड का होना महिला की जिंदगी में कोई बुरी बात नहीं है। लेकिन आज भी बहुत सी जगहों पर जब बच्चियों को पीरियड आ जाता है, तो उनकी जिंदगी चारदीवारी तक सिमट जाती है। इस पीरियड की वजह से उनका स्कूल जाना रुक जाता है। इसी बात पर कोर्ट जब अपना फैसला दे रहा था, तो इस संदर्भ में विशेष टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा है कि मासिक धर्म सज़ा का अंत होना चाहिए, ना कि लड़की की शिक्षा का। चलिए, अच्छी बात है कि यह महिलाओं के लिए एक अच्छी खबर है। कोर्ट का यह आदेश आधी दुनिया के विकास के लिए एक मील का पत्थर साबित होगा।

स्कूल में लड़कियों को मिलेंगी क्या सुविधाएं

सुप्रीम कोर्ट ने मासिक धर्म स्वच्छता को मौलिक अधिकार मानते हुए स्कूलों में कार्यात्मक शौचालय, सैनिटरी नैपकिन वेंडिंग मशीन, और डिस्पोजेबल पैड/यूनिफॉर्म के साथ एक 'मेंस्ट्रुअल हाइजीन मैनेजमेंट कॉर्नर' स्थापित करने का आदेश दिया है। इसके अलावा अब स्कूलों में मुफ्त सैनिटरी पैड उपलब्ध कराना अनिवार्य होगा। जस्टिस जेबी परदीवाला और आर महादेवन की बेंच ने यह ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इससे पीरियड को लेकर सोच भी बदलेगी। इसके साथ ही बच्चियों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका सकारात्मक प्रभाव होगा।

प्रैक्टिकल आस्पेक्ट पर परेशानी

पीरियड को लेकर हर महिला का अपना एक अनुभव है। कुछ महिलाओं को अत्यधिक रक्तस्राव होता है, तो किसी को कम। हम सभी जानते हैं कि पीरियड्स के दौरान इस्तेमाल होने वाले पैड्स का भी हाइजीन के आस्पेक्ट से सही होना बहुत ज़रूरी है। वहीं, इन्हें समय पर बदलना भी आवश्यक होता है। लेकिन बहुत बार स्कूल में इससे जुड़ी बेसिक सुविधाएं ना मिलने की वजह से बालिकाएं पैड बदलने के लिए परेशान रहती हैं। वहीं कई बार बालिकाएं छुट्टी भी करती हैं। लेकिन अब जब यह मौलिक अधिकार में शामिल हो गया है, तो परिवर्तन भी नजर आने लगेंगे। वरना बहुत से स्कूलों में पानी का नहीं होना, वॉशरूम का सुचारु रूप से नहीं चलना, पैड को डिस्पोज करने के लिए प्रॉपर इंतजाम ना होना जैसी परेशानियां लड़कियां झेलती आई हैं। यह परेशानी तब और भी बढ़ जाती है जब लड़कियां को-एड स्कूल में पढ़ती हैं।

सच में यह नॉर्मल है

हम लोग अगर बात करें, तो सच में हम लोगों ने कुछ विषयों को ना जाने क्यों टैबू बना लिया है। ऐसा ही एक विषय पीरियड भी है। हम सभी लोगों को आत्म-अवलोकन की जरूरत है कि आखिर हम लोग इसके बारे में बात करना क्यों नहीं पसंद करते। जब हम बात नहीं करते, तो कहीं ना कहीं एक ऑकवर्ड सिचुएशन हम क्रिएट करके रखते हैं। इस बात का खामियाजा हमारी नन्हीं बच्चियां भुगतती हैं। जब पीरियड उनकी जिंदगी में आता है, तो उन्हें लगता है कि पता नहीं क्या हो गया उनके साथ। इस वजह से कहीं ना कहीं उनका ध्यान भी पढ़ाई से हटता है। खैर, जब जागो तभी सवेरा है। मासिक धर्म को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश बताता है परिवर्तन की तहरीर और लैंगिक समानता में अब आमूलचूल परिवर्तन देखने मिलेगा।

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