ठंडा मतलब कोका कोला, कुछ मीठा हो जाए, फेविकोल का मज़बूत जोड़, दो बूंद ज़िंदगी की, ना जाने कितनी ही ऐसी पंचलाइन जो हमारी ज़ेहन में हमेशा मौजूद रहेंगी। उन पंचलाइंस के रचयिता पीयूष पांडे अब इस दुनिया में नहीं रहे। जब कोई बड़ा इंसान चला जाता है तो वह अक्सर मीडिया की सुर्खियों में आता है। उसके जीवन के बारे में बहुत कुछ अच्छा लिखा जाता है। पीयूष पांडे के लिए ऐसा ही कुछ लिखा और बताया जा रहा है। विज्ञापन की दुनिया के वो बेताज बादशाह थे। उनकी पंचलाइंस जितनी सुर्खियाँ बटोरती थीं, उनका जाना उतना ही खामोशी से हो गया। वो पिछले बीस दिनों से कोमा में थे। उन्हें कुछ इंफेक्शन हो गया था। खैर, मुंबई में ही उनका अंतिम संस्कार भी कर दिया गया है।
एक आम आदमी
ओगिल्वी में वर्ल्डवाइड चीफ क्रिएटिव ऑफिसर और भारत के एग्जीक्यूटिव चेयरमैन पीयूष आम चीजों में कुछ खास करना जानते थे। उनकी सोच ग्लोबल थी। वो जिस पद पर थे, उस तक पहुँचना उतना आसान नहीं होता। उन्होंने बड़े बड़े ब्रांड्स को लोगों के दिलों में पहुँचाया है। एशियन पेंट्स का ऐड "हर घर कुछ कहता है" ने उन घरों में पेंट के दरवाजे खोले जिन घरों में चूने की पुताई होती थी। अगर आप 80 के दौर को जिए हुए हैं तो आप जानते होंगे कि मिडिल क्लास की ज़िंदगी में साइकिल के बाद जब दोपहिया वाहन लूना आई थी तो वह क्रांति और तकनीक का संगम थी। लूना का वो ऐड "चल मेरी लूना" की पंचलाइन भी पीयूष पांडे ने ही दी थी। वो बदलाव को इमोशंस के साथ लोगों के बीच रखने का हुनर जानते थे। वो जानते थे कि कैसे मिडिल क्लास के साथ कंपनियाँ सपनों को बेच सकती हैं।
लेकिन इन सभी के बीच वो ‘मैं’
आमतौर पर जब एक इंसान छोटे शहर से निकलकर बहुत बड़ा हो जाता है तो वो खुद को बहुत ऊँचा समझने लगता है। कामयाबी के आसमान में उसके पंख बहुत दूर तक फैल जाते हैं। ऐसे में वो ज़मीन को देखना भूल जाता है। लेकिन पीयूष ऐसे नहीं थे। जयपुर के सेंट जेवियर्स स्कूल से स्कूलिंग करने वाले पीयूष अपनी क्रिएटिविटी का श्रेय अपने परिवार को देते थे। उनका मानना था कि घर के वातावरण में माँ बाप ने सभी को वो करने की आज़ादी दी जो वो करना चाहते थे। उनकी बड़ी बहन रमा पांडे बीबीसी में न्यूज़ रीडर रह चुकी हैं। वहीं ईला अरुण फिल्म इंडस्ट्री का जाना माना नाम हैं और बहन तृप्ति पांडे राजस्थान टूरिज्म से जुड़ी हैं। पीयूष के नौ बहन भाई हैं। उनके बड़े भाई प्रसून पांडे फिल्म निर्देशक हैं।
वो आँख मिलाकर बात करते थे
पीयूष को अपने काम के लिए साल 2016 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। उन्होंने 1982 में क्रिएटिव कंपनी ओगिल्वी एंड माथर को जॉइन किया और उसके बाद से ओगिल्वी उनका और वो ओगिल्वी के हो गए। सबसे बड़ी बात जो उनके अंदर थी, वो थी सादगी। वो बहुत बड़े आदमी थे, लेकिन लोगों से आँख मिलाकर बात करते थे। यही वजह है कि हर खास और आम आज उनके निधन पर रूँआसा है। उनके भाई ने उनके अंतिम सफर पर गीत गाया “मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा।” भारत को जोड़ने वाला यह गीत पीयूष का ही लिखा हुआ है। उनके अंतिम सफर में अमिताभ बच्चन, अभिषेक बच्चन जैसी बड़ी हस्तियाँ शामिल हुईं। लेकिन इस वक्त उनका स्कूल सेंट जेवियर्स बहुत उदास है। इस स्कूल ने अपने दो गोल्डन एल्यूमिनाई इस एक हफ्ते में ही खो दिए।
उनके जाने के बाद जो इस कंपनी ने उनके लिए लिखा है, वो आपको भी रुला देगा।
पीयूष, काश आप ये भी सिखा के जाते कि ये ऐड हम कैसे लिखें। पीयूष के बारे में लिखना आसान नहीं। पीयूष कहते थे बात को सिंपल रखो। कैसे रखें, पीयूष? अब आप तो हैं नहीं। पीयूष शायद कहते एक आम आदमी की तरह सिंपल।
पीयूष की सीख और उनका जीवन एक आम आदमी की तरह सादा था। वही आम आदमी जो उनके ऐड में दिखता है, जिसे हम कंज़्यूमर कहते हैं। पीयूष आम आदमी की तरह सोचते थे, आम आदमी के बारे में सोचते थे, और इसी तरह ब्रांड्स के बारे में सोचते थे। आखिर ब्रांड भी तो कंज़्यूमर ही बनाता है। तो पीयूष कंज़्यूमर के लिए लिखते थे, और ब्रांड अपने आप बन जाते थे।
पीयूष रोज रोज की चीज़ों की तरह आम थे, जैसे दाल रोटी, चावल, छोले सब्ज़ियाँ आम होती हैं। यही पीयूष का रोज का खाना था। जैसे किनारे में निकाली हुई यांग जैम होती है। जैसे बिना आयरन किए बाहर से पहनी शर्ट आम होती है। जैसे सुबह जल्दी उठना और काम में लग जाना आम होता है।
उनका काम था सोचना और लिखना, और देर से उठने वालों को सुबह सुबह फोन करके जगाना।टीवी पर मैच देखना भी आम होता है। तो पीयूष को क्रिकेट बहुत पसंद था। बहुत पहले जब उन्होंने क्रिकेट खेलना छोड़ दिया, तो उन्होंने बातचीत करके क्रिकेट खेलना शुरू कर दिया। हर बात को वो क्रिकेट के मुहावरों में कहते थे। हमसे कहते थे “मीटिंग में फ्रंट फुट पे खेली।” फ्रंट फुट पर खेलना ओगिल्वी की रगों में है। और ये पीयूष ने सिखाया है।
मीटिंग को वो मैच कहते थे। क्लाइंट को आइडिया अच्छा लगा तो कहते थे “हम जीत गए।” तारीफ करते थे तो “वेल प्लेड।” अपनी एडवरटाइजिंग की पारी में पीयूष प्लेइंग कैप्टन थे। आखिर तक खेलते रहे। उन्होंने विज्ञापन की दुनिया को बहुत सारे प्लेइंग कैप्टन दिए हैं, और न जाने कितने फ्यूचर केस को पंख दिए हैं।
दूसरे शब्दों में कहें तो पीयूष एम्पावर करते थे। बहुत बड़ी बात है ये।
मौका कुछ अजीब है, हँसी की बात करने का। मगर पीयूष की बात बगैर उनकी हँसी की बात किए नहीं हो सकती।
पीयूष बच्चों की तरह हँसते थे। वो इतनी ज़ोर से हँसते थे कि हमें उन्हें ढूँढना नहीं पड़ता था। यही हँसी वो सुबह से लेकर रात तक बिखेरते रहते थे, छिड़कते रहते थे। हर बात को वो जोक बना सकते थे, और हर जोक को एक कहने लायक बात या एक ऐड। उनके ऐड इसी खुशी के रंगों में सराबोर हैं।
मगर क्लाइंट्स के बिज़नेस को वो बहुत सीरियसली लेते थे। इसीलिए जब वो कहते थे “ट्रस्ट मी”, तो क्लाइंट उन पर भरोसा करते थे। पीयूष कहते थे “आप किसी से ट्रस्ट मी कहकर उसका भरोसा नहीं जीत सकते। भरोसा तो आप जो करते हैं उससे आता है।” पीयूष बहुत कुछ करते थे, और खुद करते थे। उसके बाद कहते थे “ट्रस्ट मी।” तो क्लाइंट उनकी बात मानते थे।
“ट्रस्ट मी”, “मज़ा आएगा”, और “बढ़िया बनेगा” स्ट्रेटजी हो सकती है, पर ये पीयूष से सीखने की बातें हैं।
खैर, मौका विदाई का है और ओगिल्वी, जिसमें वो काम करते थे, उन्होंने पीयूष के लिए आख़िरी ऐड बहुत खूबसूरती से लिखा है। इसमें उन्होंने हँसी की बात लिखी है। वाक़ई में जो लोग उनसे पर्सनली मिल चुके हैं, वो जानते हैं कि पीयूष के लिए हँसना, मुस्कुराना और ठहाके लगाना कितना ज़रूरी था। ऐसे में हमारी ज़िम्मेदारी है कि अब हम भी उन्हें याद करें तो मुस्कुराकर।
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