आदिवासी दिवस: प्रकृति के साथ जुड़े हुए जीवन की कहानी

आदिवासी दिवस: प्रकृति के साथ जुड़े हुए जीवन की कहानी

9 अगस्त, आदिवासी दिवस.. विश्व भर में आदिवासी समुदाय में जागरूकता फैलाने और इनके अधिकारों के संरक्षण के लिए यह दिवस मनाया जाता है। कौन हैं ये आदिवासी? कैसे दिखते हैं? आखिर इतने ज़रूरी क्यों हैं, कि पूरे विश्व में इनके नाम का एक दिन आरक्षित है? क्या ये वैसे होते हैं जैसा फ़िल्मों में दिखते हैं? घने जंगलों में अपने अधनंगे शरीर पर पेड़ के पत्ते बांधे हुए, आग के आसपास झींगा लाला हु करते हुए कुछ लोग.. नहीं, बिल्कुल नहीं... आदिवासी समुदाय हमारे समाज की दृष्टि से एक पिछड़ा वर्ग है, जो विकास की धारा में खुद को जोड़ नहीं पाया। वैसे तो यह एक व्यक्ति, एक समुदाय की निजी इच्छा है कि उसका रहन-सहन कैसा होगा, इसलिए हम किसी को परिभाषित नहीं कर सकते कि कोई व्यक्ति या समुदाय पिछड़ा है या नहीं। खैर, इस समुदाय की जड़ें प्रकृति से जुड़ी हुई हैं, इनका धर्म, रहन-सहन, त्यौहार, खान-पान यहाँ तक कि हर दैनिक कार्य का संबंध सीधा पंचतत्वों से होता है। ये प्रकृति को किसी भी प्रकार की हानि पहुँचाना पाप मानते हैं, और इसी लिए शायद हमारे सो कॉल्ड विकसित समाज से बहुत पीछे हैं, क्योंकि हमने खुद को बेहतर बनाने के चक्कर में प्रकृति का इतना विनाश किया है, जिसकी भरपाई मुश्किल है। आज जो हम इतना सेव अर्थ, सेव वाटर, सेव एनवायरनमेंट के नारे लगाते हैं, अगर इन पिछड़े लोगों का पर्यावरण को सहेजने का ज़रा सा तरीका अपना लेते तो शायद न ये ग्लोबल वार्मिंग झेलनी पड़ती, न इससे होने वाली और दूसरी परेशानियां उठानी पड़तीं। बाज़ार में ऑर्गैनिक के नाम पर लूट मची है, कंपनियां मनमाने दामों पर अपने उत्पाद बेच रही हैं, और हम खरीद रहे हैं, क्यों? क्योंकि हमें डर है कि जो सब्ज़ी हम खा रहे हैं, उसमें कीटनाशक का प्रयोग न हुआ हो। आदिवासी समुदाय के छोटे किसान अपनी फसलों में देसी खाद का इस्तेमाल करते हैं, और उनसे जो फसल उगती है वो असली ऑर्गैनिक होती है, लेकिन उन्हें इसके लिए क्या मिलता है? हमें यह मानना होगा कि आज पर्यावरण को बचाने में इन समुदायों के बहुत बड़ा हाथ है, ये लोग सदियों से वो काम करते आ रहे हैं, जिसके लिए आज सरकारें, बड़ी बड़ी स्वयंसेवा संस्थाएं, बड़े बड़े सेलिब्रिटी ज़ोर दे रहे हैं कि पेड़ लगाइये, पानी बचाइए, शोर कम कीजिये, प्रकृति को जितना हो सके उतना सहेजिये। इनको सम्मान देने के लिए शायद इतना काफी होगा कि हम इनके कुछ तरीकों को अपने जीवन में उतारें और इन्हें पिछड़ा समझने के बदले यह समझें कि अगर हम अब भी नहीं संभले तो हम कितने पिछड़ जाएंगे।

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