अलविदा विनोद कुमार शुक्ला, हमारी पीढ़ी के प्रेमचंद्र

अलविदा विनोद कुमार शुक्ला, हमारी पीढ़ी के प्रेमचंद्र

विनोद कुमार शुक्ला नहीं रहे, वे काफी दिनों से बीमार थे, अस्तपाल में भर्ती थे। हम जैसे उनके प्रशंसकों को पता था कि यह खबर आने वाले ही वाली है। उनकी मृत्य पर हैरानी नहीं है। हां लेकिन जाना दुख देता है। सालता है। वो अस्पताल की उस मृतशैय्या पर अपनी लेखनी के साथ व्यस्त थे। अखबार पढ़ रहे थे लिख रहे थे। वो मौन की आवाज की आवाज को भी समझते थे। एक विद्वान थे। वो ऐसा बहुत कुछ समझ पाते थे जिसका हम अहसास तक नहीं कर पाते थे। वो सपनों के कवि या कथाकार नहीं थे। वो मजदूरों के लिए लिखते थे। नक्सल संघर्ष के लिए लिखते थे। बस्तर के आदिवासियों, किसानों की आत्महत्या, पलायन, इन सब पर उन्होंने खूब लिखा। लेकिन इस लिखे में वे आंकड़ों या नारों की भाषा से दूर रहे। उनकी कविताओं में, कहानियों में और उपन्यास में भी नारेबाजी नहीं दर्द है। राजनीति नहीं है। वो धरती पर मनुष्य के पक्ष में खड़े अपनी कलम थामे नजर आते हैं। वो घर के लिए लिख लिखते थे। वो हमेशा घर लौटना चाहते थे। ऐसा इसलिए क्योंकि घर में एक संदूक होता है। संदूक में स्मृति होती है। और स्मृतियों में जीवन का सार।

यह वादा है आपसे

जिस घर में वो लौट जाने की चाह रखते थे। यानी रायपुर के जिस घर में वो रहते थे। वो घर आज खामोश है। उस घर को भी पता चल गया कि मालिक अब खामोश हो चुके हैं। उस घर ने ना जाने कितनी ही बार पन्नों, स्याही और विनोद जी को मिलते हुए देखा है। रायपुर में उनके जाने के बाद ही हिंदी साहित्य का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त हो गया। लेकिन हम सभी लोग जो साहित्य को पसंद करते हैं विनोद कुमार शुक्ला को पसंद करते हैं। अब हमारी यह जिम्मेदारी है कि हम इस साधारण से असाधारण आदमी के साहित्य को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी लेकर जाएं। हमें अपने बच्चों की साहित्य से दोस्ती करवानी है। उन्हें विनोद कुमार शुक्ला का लिखा पढ़ाना है। तभी तो वो नौकर के उपन्यास को पढ़ते हुए जान पाएगा कि कैसे एक सराकारी क्लर्क संतू अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा पाने के लिए बैचेन है।

वो कविता जो सोशल मीडिया पर साझा की जा रही है

आपके साथ हम विनोद कुमार शुक्ला की वो कविता साझा कर रहे हैं जो उनके जीवन के फलसफे को बताता है। इस कविता का शीर्षक है- जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे।

जो मेरे घर कभी नहीं आएंगे
मैं उनसे मिलने

उनके पास चला जाऊंगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर

नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊंगा

कुछ तैरूंगा और डूब जाऊंगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब

असंख्य पेड़ खेत
कभी नहीं आएंगे मेरे घर

खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गांव-गांव, जंगल-गलियां जाऊंगा।

जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं

उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूंगा

इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूंगा।

अलविदा सर

आप सो चुके हैं। कभी ना उठने के लिए। आपने अपने जीवन के 88 वर्ष देखे। इस 88 साल में 65 साल आपने सक्रिय लेखन किया। छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध कवि, कथाकार और उपन्यासकार अलविदा। आपको अपने साहित्यक योगदान के लिए ज्ञानपीठ समेत कई पुरस्कारों से सम्मानित किए गए।  सम्मान और पुरस्कारों की लंबी फेहरिश्त में मशहूर पेन अमेरिकन सेंटर लिटरेरी अवार्ड भी शामिल है। उनके प्रसिद्ध उपन्यास दीवार में एक खिड़की रहती थी के लिए 30 लाख की रॉयलटी भी मिली थी। जो कि हिंदी लेखन के लिए एक बड़ी उपलब्धी है। अगर आपको हिंदी से प्यार है। शब्दों के साथ एहसासों को आप जोड़ना चाहते हैं तो विनोद कुमार शुक्ला को जरुर पढ़िएगा। आपको क्या पढ़ना है? यह हम आपको नहीं बता रहे। इंटरनेट पर सर्च करिए और गाते लगाइए उस रचनात्मक संसार में जहां इस कथाकार की उपस्थिति आपको महसूस होगी। अब उनकी एक विदाई कविता के साथ ही उन्हें विदा करते हैं।


जाते जाते ही मिलेंगे लोग उधर के
जाते-जाते जाया जा सकेगा उस पार

जाकर ही वहां पहुंचा जा सकेगा
जो बहुत दूर संभव है

पहुंचकर संभव होगा
जाते-जाते छूटता रहेगा पीछे

जाते-जाते बचा रहेगा आगे
जाते-जाते कुछ भी नहीं बचेगा जब

तब सब कुछ पीछे बचा रहेगा
और कुछ भी नहीं में


सब कुछ होना बचा रहेगा।

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