इंटरनेशनल मेंस डे के बारे में जानते हैं वो रोचक बातें जो सभी को पता होनी चाहिए

इंटरनेशनल मेंस डे के बारे में जानते हैं वो रोचक बातें जो सभी को पता होनी चाहिए

हम अक्सर ही महिलाओं के अधिकारों की बात करते हैं। हम चाहते हैं कि आधी दुनिया को वो सभी कुछ मिले जो उनका अधिकार है। लेकिन अगर हम बात पुरुषों की करें तो समाज की संरचना में उनके योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता। पुरुषों के इसी योगदान को देखते हुए साल 1994 से यूरोप के एक देश माल्टा में इंटरनेशनल मेंस डे सेलिब्रेट किया जा रहा है। पहले यह दिवस 7 फरवरी को मनाया जाता था। लेकिन साल 2009 में माल्टा की AMR कमेटी ने तारीख बदलकर इसे 19 नवंबर कर दिया।

तो आखिर क्यों मनाया जाता है मेंस डे

पुरुष और महिला दोनों ही इस सभ्य समाज का हिस्सा हैं। ऐसे में पुरुषों के योगदान को सम्मान देने के लिए यह दिवस मनाया जाता है। हालांकि इस दिवस को फिलहाल संयुक्त राष्ट्र की ओर से औपचारिक पुष्टि नहीं मिली है। लेकिन दुनिया भर के लगभग 80 देशों के संगठन आगे आए हैं। यह दिन अब काफी विख्यात हो चुका है। इस बार इस दिवस की थीम की बात करें तो वह है सेलिब्रेटिंग मेन एंड बॉयज़। इस थीम के पीछे का उद्देश्य एक सामाजिक संवाद को स्थापित करना है। जिससे कि अलग-अलग देशों और समुदायों के बीच में उन मुद्दों पर बात उठें जिन पर कभी आवाज ही नहीं उठाई जाती।

उनके पास भी हैं भावनाएं

अक्सर महिलाओं की बात करते हैं लेकिन इन सभी के बीच में एक पुरुष के बारे में हम सोचना ही नहीं चाहते। लेकिन आपको पता है कि पुरुष भी भावुक होते हैं। वो भी कई बार अवसाद, एंग्ज़ायटी, अकेलेपन की समस्या से जूझ रहे होते हैं। हैरानी की बात है कि वे पुरुष जो बहुत खामोश रहते हैं, अपने परिवार के सामने एक एंग्री मैन का रूप लिए खड़े होते हैं उनका दिल मोम का होता है। वो परिवार के सामने भी खुलकर स्वयं को व्यक्त नहीं करते। लेकिन वो अक्सर तन्हाई का शिकार होते हैं। हमें दूर से देखकर लगता है कि इन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन हकीकत कुछ और होती है।

वो माहौल बनाना होगा

अब वो समय आ चुका है कि हमें महिलाओं के साथ पुरुषों के मेंटल पीस के बारे में भी सोचना होगा। हालांकि अब बहुत कुछ बदल गया है अब पुरुष भी अपनी बात कहने लगे हैं। वो अपनी परेशानियां परिवार के साथ साझा करने लगे हैं। इस पीढ़ी के कूल डैड के घर में एंटर होने के बाद घर में कर्फ्यू-सा माहौल नहीं होता। लेकिन फिर भी बहुत कुछ बदलने की गुंजाइश अभी बाकी है। पुरुषों को हमारी बॉलीवुड फिल्मों ने एक नायक की छवि दी है। यह बताया है कि वो कभी नहीं थकता, वो कभी नहीं टूटता। हे पुरुष, आप अपने रोल में परफेक्ट हैं। लेकिन आपसे एक विनती है कि आप भी खुद को कहना शुरू करें। आप भी बताया करें कि ओवरटाइम के बाद आप भी थक जाते हैं। आप भी बताया करें कि अपनों की याद आपको भी आती है। आपके मन में भी भावनाओं के बादल उमड़ते-घुमड़ते हैं।

बता दीजिए आप

हम महिलाएं सोचती हैं कि हमारे हसबैंड आज़ाद महसूस करते हैं जब हम मायके चले आते हैं। वो देर रात तक अपने दोस्तों के साथ घूमते हैं, मज़े करते हैं। लेकिन एक हैरानी की बात आपको बताऊं। वो मज़े नहीं कर रहे होते। उन्हें आपके और अपने परिवार के बिना घर जैसे काटने को दौड़ता है। इस अकेलेपन से बचने के लिए वो भाग रहे होते हैं। बस बताने की कला नहीं आती। आपको फोन पर यह नहीं कह पाते कि तुम्हारे बिना मन नहीं लग रहा मेरा। बस आपके बार-बार वापस आने की उलाहना देते हैं। आप नाराज़ हो जाती हैं और सोचती हैं कि मुझे मेरे मायके में रहने भी नहीं देते। लेकिन सच यह है कि अकेले तो वो नहीं रह पाते बस बताने का हुनर नहीं जानते।           

लेकिन इस इंटरनेशनल मेंस डे हर महिला अपने आस के पुरुषों के लिए खुद से वादा करें कि वो उन्हें समझने का पूरा प्रयास करेंगी और पुरुष भी खुद को एक पारंपरिक सांचे से निकालने की कोशिश करें। फिर देखिए कितने खूबसूरत बदलाव आप महसूस करेंगे।

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