जेन जी तो जेन जी हैं। उनके बातें करने और जिंदगी जीने के तौर-तरीके अपने आप में अलग हैं। उन्हें न चार लोगों की परवाह है और न ही वे यह जानने की कोशिश करते हैं कि चार लोग उनके बारे में क्या सोचते हैं। वे अपनी दुनिया में मस्त और बिंदास लोग हैं। इस जेन जी ने कई मौकों पर हमें बताया है कि जिंदगी को लेकर वे बहुत व्यावहारिक भी हैं। सोशल मीडिया, जो जेन जी की जन्मस्थली है, उस पर एक नया ट्रेंड आया है—डी-इनफ्लुएंसिंग का। यानी कि ट्रेंड को फॉलो करने वाल जेन जी अब ट्रेंड पर सवाल उठा रही है।
हम सब लोग, जो इंटरनेट की दुनिया में पल-बढ़ रहे हैं, जानते हैं कि ऑनलाइन सामान मंगवाना हमारी जिंदगी में कितना आम हो चुका है। अब लोगों के घर में डोरबेल की घंटी किसी मेहमान के आने पर नहीं, बल्कि कुरियर वाले के आने पर बजती है। कभी कुरियर वाला सामान लेकर आता है, तो कभी कोई कैंसिल ऑर्डर लेने आता है। खैर, अब यह नए जमाने का चलन है, लेकिन इस नए चलन के बीच एक नया कॉन्सेप्ट डी-इनफ्लुएंसिंग आया है, जो हर समय इन्फ्लुएंसर्स से प्रभावित होकर ऑनलाइन खरीदारी करने की हमारी आदत को थोड़ा थामने की सलाह दे रहा है।
हमसे बेहतर हमें कोई नहीं जानता
हम सभी ऑनलाइन शॉपिंग करते हैं, तो हमें पता होता है कि मंगवाए जाने वाले उन प्रोडक्ट्स की हमें जरूरत भी नहीं होती। बस, कई बार डिस्काउंट का लालच तो कभी सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स का प्रभाव हम पर इतना हावी हो जाता है कि हम उन चीजों को खरीद लेते हैं। वे बाद में काम आएँ या न आएँ, बस इस बात से मन को एक मनोवैज्ञानिक तसल्ली हो जाती है कि हमने वह ऑर्डर कर दिया है और अब वह प्रोडक्ट हमारी दराज में मौजूद है।
हाँ, जब वह प्रोडक्ट आ जाता है, तब एक-दो बार उसका इस्तेमाल करके हम तसल्ली कर लेते हैं। हमें अच्छा भी महसूस होता है। लेकिन दोबारा उसका इस्तेमाल कब होगा, इस सवाल का जवाब हमारे पास नहीं होता।
जानते हैं, क्या है डी-इनफ्लुएंसिंग?
डी-इनफ्लुएंसिंग असल में सोशल मीडिया का ही एक ऐसा ट्रेंड है, जो बता रहा है कि ऑनलाइन शॉपिंग करने से पहले सोचें कि क्या वाकई आपको इस प्रोडक्ट की जरूरत है? क्या यह आपके बजट में आता है? क्या आप इससे सस्ती या इसी क्वालिटी की कोई बेहतर चीज ले सकते हैं? इसके अलावा, यह भी हो सकता है कि इससे मिलता-जुलता कोई प्रोडक्ट आपके पास पहले से ही मौजूद हो।
सरल शब्दों में कहें, तो यह हमें फिजूलखर्ची करने से रोकता है। हम भी जानते हैं कि सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स कई बार हमें बहुत से प्रोडक्ट्स की जानकारी देते हैं, जिन्हें हम सिर्फ इसलिए खरीद लेते हैं, क्योंकि वे बहुत वायरल हो रहे होते हैं। लेकिन डी-इनफ्लुएंसिंग हमें बता रहा है कि हमें हर ट्रेंड के पीछे भागने की जरूरत नहीं है। बल्कि, अगर हम किसी चीज को खरीदना चाहें, तो खरीदें, लेकिन उसे खरीदने से पहले सोचें।
हमारे बड़े तो शायद खुश हो जाएंगे
अब हमें तो भई, ऑनलाइन शॉपिंग का एक चस्का लग चुका है। लेकिन हाँ, डी-इनफ्लुएंसिंग शायद हमारे बड़ों को बहुत पसंद आने वाला है। आपको याद ही होगा कि जब ऑनलाइन शॉपिंग का जमाना नया-नया आया था, तो हमें बड़ा मजा आया था। हमारे बड़ों को भी लगा था कि घर बैठे-बैठे सामान आ जाना कितनी सहूलियत की बात है।
बेशक, घर बैठे सामान आना अच्छा होता है, लेकिन हर चीज के कुछ अच्छे और बुरे पहलू होते हैं। हम चाहें मानें या न मानें, लेकिन हम लोग कहीं-न-कहीं फिजूलखर्ची भी करने लगे हैं। हम सभी को सोचना होगा कि हम जो इतने सारे प्रोडक्ट्स मंगवाते हैं और हमारे पास चीजों का इतना बड़ा कलेक्शन होता है, क्या सच में उन सब चीजों की जरूरत होती है?
सच है कि जमाना फिर से लौट आया है
सोशल मीडिया के इस कॉन्सेप्ट ने एक बार फिर साबित कर दिया कि जमाना वाकई लौटकर आता है। यह ट्रेंड वाकई अपनाने लायक है। अपने पैसे खर्च करना और उससे एंजॉय करना, हम सभी का पूरा अधिकार है। यह जिंदगी एक ही बार मिली है। अच्छी बात है कि आज महिलाएँ भी फाइनेंशियली इंडिपेंडेंट हैं। ऐसे में पैसे को कैसे खर्च किया जाए, यह हर इंसान का बेहद निजी मामला है।
लेकिन इस बात को याद रखें कि आप पैसा बहुत मेहनत करके कमाते हैं। ऐसे में अपने पैसे का सही इस्तेमाल करना और उसे सोच-समझकर खर्च करना आपकी नैतिक जिम्मेदारी है।



