हम सभी लोग इस दुनिया में एक तय समय के लिए हैं। हम सभी मानते हैं कि हम सभी के आने और जाने का वक्त ऊपरवाला तय करता है। कुछ लोगों पर ऊपरवाला बड़ा मेहरबान होता है। वो एक अच्छी उम्र भी गुजारते हैं और सेहतमंद भी रहते हैं। वहीं कुछ लोगों के खाते में ऊपरवाला उम्र तो ज्यादा लिख देता है, लेकिन सेहत के मामले में थोड़ी कंजूसी कर देता है। वहीं कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो कि एक औसत आयु गुजारकर अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर इस दुनिया से चले जाते हैं।
सेहत से भरा जीवन हर कोई चाहता है
हम जहां तक सोचते हैं कि एक अच्छा और सेहत से भरा जीवन हर कोई चाहता है। लेकिन चाहने में और होने में बहुत फर्क होता है। आजकल परिवार की स्थितियां भी बहुत अलग हैं। परिवार की परिभाषा भी बदल चुकी है। 80 के दशक में वो माएं, जो खुद स्कूल ड्रॉपआउट रहीं और घर-गृहस्थी को अपना संसार माना। आज उन मांओं की बेटियां न केवल बड़ी हो चुकी हैं, बल्कि वो कामकाजी होकर एक गृहस्थ जीवन जी रही हैं। वो ऑफिस और घर, दोनों संभाल रही हैं। उनके पास अपने लिए भी समय नहीं है। ऐसे में वो बहुएं बुजुर्गों का वह ख्याल नहीं रख पा रहीं, जिसकी जरूरत है। वहीं बुजुर्ग भी इन घरों में एक एकाकी-सा जीवन बिता रहे हैं। यहां तक तो स्थितियां कहीं-न-कहीं समझ में आती हैं। हम समझ पा रहे हैं कि यह दौर ही भागमभाग का है। कोई करे भी तो क्या...? लोगों के पास अपने लिए ही समय नहीं है। वे किसी को क्या देंगे?
लेकिन यह भी तो नहीं होना चाहिए
लेकिन बुजुर्गों का वृद्धाश्रम में रहना, परिवार की ओर से कोई सुध न लेना, अगर वे गुजर जाएं तो उन्हें अंतिम विदा देने तक न आ पाना समझ से परे है। हाल ही में एक बुजुर्ग की वृद्धाश्रम में मृत्यु के बाद, जब एक बेटी अंतिम संस्कार के क्रियाक्रम को देख रही थी, तब अचानक से उसने सवाल किया कि और कितना समय लगेगा। इस सवाल को करते वक्त उसे शायद अंदाजा नहीं होगा कि वो कितने सवालों को पीछे छोड़ रही है। उसे जल्दी थी। वो बिजी थी। यह तो शुक्र है कि जमाना ऑनलाइन है कि एक बेटी ने अपने पिता के अंतिम संस्कार के लिए 51,000 रुपये भिजवा दिए। खैर, वो पैसे नहीं भी आते, तो काम तो हो ही जाता। जाने वाला तो चला ही जाता है।
वो तो बेटियां थीं
यह घटना सोनीपत के ओल्ड एज होम की है। यह बुजुर्ग मुंबई में कपड़े के व्यापारी थे। पिछले डेढ़ साल से यहां अपनी पत्नी के साथ रह रहे थे। पत्नी का भी कुछ समय पहले देहांत हो गया था। इनकी तीन बेटियां हैं। एक बेटी नेपाल, एक बेटी उत्तर प्रदेश और एक बेटी मुंबई में रहती है। पिछले बीस दिनों से इन बुजुर्ग की सेहत कुछ ठीक नहीं चल रही थी। बेटियों को इस संदर्भ में बताया भी गया था। लेकिन तीनों बेटियों में से कोई भी उनसे मिलने तक नहीं आया। यहां तक कि जब उनका देहांत हुआ और अंतिम संस्कार के लिए ओल्ड एज होम की ओर से आने की बात कही गई। यह तक कहा गया कि हम बॉडी को फ्रीजर में रखवा देते हैं, आप आ जाइए। लेकिन कहा गया कि दूरी बहुत है, आप अंतिम संस्कार कर दीजिए। अस्थियों को रख लीजिएगा, हम ले जाएंगे। खैर, बाद में इन बेटियों का तर्क था कि अब पिता तो रहे नहीं। आप अस्थियां भी खुद ही प्रवाहित कर दीजिएगा।
संवेदनहीनता की पराकाष्ठा
इस पूरी घटना और बातचीत से हम समझ सकते हैं कि कितनी संवेदनहीनता है। लोग कहते हैं कि बेटे और बहू मां-बाप का ध्यान नहीं रख पाते। लेकिन यह तो बेटियां थीं। तीनों में से किसी एक के पास अपने पिता को अंतिम विदाई देने की भी फुर्सत नहीं थी। ऑनलाइन भी जब एक बेटी अपने पिता को हमेशा के लिए जाता हुआ देख रही थी, तो उसके लिए भी उसके पास समय की कमी थी।
मां-बाप का फर्ज और हमारा...
चलो मान लिया कि मां-बाप का फर्ज होता है अपने बच्चों का लालन-पालन करना। लेकिन बड़े हो जाने के बाद क्या बच्चों का कोई फर्ज नहीं होता अपने मां-बाप के लिए? 74 साल के यह बुजुर्ग क्या इतने सम्मान के अधिकारी नहीं थे कि बेटियां फुर्सत से अपने पिता को जाता हुआ ही देख लेतीं। बीस दिन से वो बीमार थे। एक बार उनसे मिलने ही आ जातीं। खैर, यह बुजुर्ग अब जा चुके हैं।
बूढ़ा तो हमें भी होना है
वे लोग, जो बुजुर्गों को ओल्ड एज होम भेज रहे हैं, आखिर बूढ़ा तो उनको भी होना है। आप ही के बच्चे घर से बुजुर्गों को जाता हुआ देख रहे हैं। आप सोचिए कि आप उन्हें क्या सिखा रहे हैं। यह बेटियां, जो आज बहुत बिजी हैं, कल शायद रिटायर भी होंगी। फिर शायद आरामकुर्सी पर बैठकर समझ पाएंगी कि उनकी पूरी जिंदगी बनाने वाले उनके पिता के पास उनके लिए समय नहीं था। सच है कि डरना चाहिए इस पीढ़ी को अपने बुढ़ापे से। क्योंकि जो बोते हैं, वही काटते हैं।
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