बच्चों के हाथ में मोबाइल कैसे आया है? इस सवाल का जवाब आप ढूंढें

बच्चों के हाथ में मोबाइल कैसे आया है? इस सवाल का जवाब आप ढूंढें

अगर हम आज के दौर की बात करें तो सारी पेरेंट्स कम्युनिटी इस बात को लेकर परेशान है कि आखिर हम अपने बच्चों से किस तरह से मोबाइल को दूर करें। अगर मोबाइल नहीं होता तो हमारे बच्चे इरिटेट होने लगते हैं। वहीं दो महीने पहले नोएडा में हुई दुर्घटना ने तो मोबाइल के एडिक्शन के दुष्प्रभाव सामने लाकर खड़ा कर दिया है। जहां तीन बहनों ने इसलिए आत्महत्या कर ली कि वो कोरियन गेम्स खेलती थीं और कहीं ना कहीं एक कोरियन लाइफ को इंडिया में जी रही थीं। पिता ने जब मोबाइल देखने को मना किया तो उन्होंने अपनी जिंदगी को खत्म करना ज्यादा उचित समझा।

अब सवाल यह नहीं है कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? उन्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। बच्चों के मोबाइल एडिक्शन पर बात होगी। दो-चार दिन बाद हम इस घटना को भूल जाएंगे। हम फिर अपने मोबाइल में व्यस्त हो जाएंगे। और बीच-बीच में जब हमें फुर्सत मिलेगी तो मोबाइल से आंख उठाकर बातचीत करना जारी रखेंगे कि आजकल तो लोग बहुत मोबाइल देखते हैं। हमारे जमाने में तो भई मिलने-मिलाने का रिवाज था।

तो भई आप रिवाज को छोड़ क्यों दिया

हम लोग वो हैं जिन्होंने मोबाइल के साथ और मोबाइल के बिना की दुनिया को देखा है। कमाल की बात है कि मोबाइल के नुकसान गिनाने में हम बहुत आगे हैं। लेकिन रील्स देखने का और व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी पर आ रही न्यूज को सुनने का चस्का हममें भी कुछ कम नहीं है। इंसान सबसे पहले स्वयं को सुधारता है। तो सबसे पहले हम तय करें कि हम मोबाइल थोड़ा कम देखेंगे। हम रात को सोते वक्त नींद आ रही है इसलिए मोबाइल देख रहे हैं के बहाने को अपनी जिंदगी से निकाल देंगे।

तो फिर क्या करें

अब जरा हम लोग यह याद करने की कोशिश करें कि हमारे सुनहरे पुराने जमाने में जब हमें रात को नींद नहीं आती थी तो हम करते क्या थे। तो हमें याद आएगा कि हमारे ही घर में कुछ लोग ऐसे थे जो बिस्तर पर जाते ही नींद के आगोश में समा जाते थे। वहीं कुछ लोग बिस्तर पर आंख बंद कर लेट जाते थे। तो कुछ लोग कुछ अच्छी आदतों को फॉलो करते थे, जैसे कि कोई ना कोई किताब पढ़ते थे। तो बस हम भी कुछ ऐसा ही करने की कोशिश कर सकते हैं, नींद आ ही जाएगी।

जावेद अख्तर की वो बात याद करिए

हाल ही में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल खत्म हुआ है। जावेद अख्तर चूंकि लिखने-लिखाने वाले एक इंसान हैं। ऐसे में जब सेशन में किसी ने उनसे कहा कि सर आप बताएं कि आजकल पढ़ने-पढ़ाने का बहुत कम माहौल हो गया है। बच्चे किताबें पढ़ते ही नहीं। इस पर जावेद अख्तर ने बहुत तपाक से उनसे पूछा कि आप आजकल कौन सी किताब पढ़ रहे हैं? इस सवाल का जवाब पूछने वाला नहीं दे पाया तब जावेद अख्तर ने कहा कि आप बच्चों को ब्लेम करना छोड़ दीजिए। आप खुद देखिए कि आप कितनी किताबें पढ़ रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसी और को मैं क्या कहूं, मैं खुद इस बात को स्वीकारता हूं कि पहले मैं खुद बहुत किताबें पढ़ता था और आजकल पहले के मुकाबले थोड़ा कम पढ़ता हूं। मोबाइल मेरा भी समय बर्बाद करता है।

तो बस हम अपने आप को ठीक कर सकते हैं। मोबाइल अच्छी भी चीज है और बुरी भी चीज है। इसका इस्तेमाल करने का तरीका हमें पता होना चाहिए। और हां, हम मोबाइल के नियंत्रण में नहीं, मोबाइल हमारे नियंत्रण में होना चाहिए। वरना हमें पता भी नहीं चलेगा और यह ऑनलाइन दुनिया वास्तविकता से हमें बहुत परे ले जाएगी। आगे आप खुद समझदार हैं।

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