क़ुदरत से नाता जोड़ने की ज़रूरत: एक माँ की अपील

क़ुदरत से नाता जोड़ने की ज़रूरत: एक माँ की अपील

बच्चों को मौसम का मजा लेने दें, उन्हें बारिश में भीगने का अहसास तो लेने दें। हम आजकल के पेरेंट्स अपने बच्चों को लेकर बड़े ही पज़ेसिव हैं। इतने कि शायद हमने उन्हें रूई का फाहा बना लिया। कहीं ऐसा तो नहीं है कि हमारी आज की यह परवाह उनके लिए आगे चलकर जी का जंजाल बन जाएगी? सोचने की बात है।

अरे सुनो बेटा, गीले में मत जाना, तुम फिसल जाओगी। बेटा, देखो मेरे मना करने के बावजूद भी तुमने खिड़की खोल ही ली थी ना जब बारिश हो रही थी। देख लिया नतीजा... छीकें आने लग गई तुम्हें। कल शाम जब अपनी सहेली के घर ऐसे ही मिलने गई तो देखा कि वो अपनी बेटी को इसी अंदाज में डांट रही थी। उसकी आठ साल की बेटी वो शायद कुदरत से एक नाता जोड़ना चाहती थी। तभी तो उस मासूम ने बरसते पानी को देखकर अपनी हथेली में उन बूंदों के अहसास को समेटना चाहा।

लेकिन उसकी प्यारी मां को उसकी यह अदा पसंद नहीं आई। बच्ची को शायद आदत भी नहीं थी इन सभी चीजों की। उसे शायद कुछ हरारत भी हो रही थी। खैर आज का जमाना बहुत कहने सुनने का रह भी कहां गया है। दिल में तो आया कह दूं, लेकिन यह सोचकर खामोश रही कि अगर आजकल पेरेंट्स अपने बच्चे को कुछ कह रहे हों तो बीच में बोलना मना है।

लेकिन मेरा दिल बहुत से सवालों से घिर गया। मैं सोचनी लगी क्या सच में हम आजकल के पेरेंट्स अपने बच्चों को इस परवाह के चक्कर में जिंदगी को जीने दे रहे हैं? वो नाव बनाना सोचते-सोचते यादों की नाव में बैठकर में उस गली चली गई जहां बचपन कुलांचे मारता है। मैं सोचने लगीं कि ड्राइंग और क्राफ्ट में बहुत अच्छी नहीं थी लेकिन जहां कहीं भी बारिश का पानी का इकट्‌ठा हुआ और मैं चल देती थी अखबार के साथ अपनी नाव बनाने। उस नाव को बनाने में कितना मजा आता था बता नहीं सकती। शायद भीगने दिया जा सकता है।

अब भई मैं एक बच्चे की मां हूं। अपने बच्चे से उतना ही प्यार करती हूं जितनी दूसरी माएं करती हैं। शायद अपनी जान से भी ज्यादा, लेकिन जब भी बारिश होती है उसे भीगने देती हूं। वह बारिश में झूमता है। हालांकि सर्दी जुकाम की परेशानियां उसके साथ हैं। लेकिन वह बीमार हो जाएगा इस चक्कर में उसके बचपन के रंग कैसे छीन लूं मैं?

हां, भीगने के बाद उसे चाय, कॉफी या सूप पिला देती हूं। रात को उसे विक्स के साथ भाप दे देती हूं। सर्दी-जुकाम आने से पहले ही भाग जाता है।

एक कंट्रोल दुनिया नहीं दे सकते हम। एसी सभी की तरह मेरी जिंदगी का भी एक अहम हिस्सा है। मैं मानती हूं कि यह साइंस की बेस्ट ईजाद में से एक है। आप गर्मी में सुकून की नींद ऐसी में लेते हो।

लेकिन बच्चों को मौसम की ज्यादती का तो नहीं, लेकिन उसकी मिठास का अहसास तो हम लेने दे सकते हैं। बारिश के पानी में "छपाक" करने का मजा तो उन्हें होना चाहिए ना। उन्हें पता होना चाहिए कि जब गालों पर बारिश पड़ती है तो उसका अहसास कैसा होता ह?

मैं सिर्फ यही कहूंगी कि उन्हें कुदरत से नाता जोड़ने दीजिए, जिंदगी को जीने दीजिए। कल जब वो बड़े होंगे तो उनके पास भी तो यादों की ऐसी ही मीठी पोटली होनी चाहिए जो कि हमारे पास है। मैं यह नहीं कह रही कि आप मेरी बात पर अमल कर लें, लेकिन सोचिएगा जरूर।

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