साड़ी पहनकर लड़कियों को फुटबॉल सिखाती हैं भारती मुड़ी, कभी खुद भी देखा था फुटबॉलर बनने का सपना

साड़ी पहनकर लड़कियों को फुटबॉल सिखाती हैं भारती मुड़ी, कभी खुद भी देखा था फुटबॉलर बनने का सपना

फुटबॉल वर्ल्ड कप का रोमांच भले ही खत्म हो गया हो, लेकिन फुटबॉल के मैदान पर सपने देखने और उन्हें पूरा करने का सिलसिला जारी है। पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले के एक छोटे से गांव में भी कुछ ऐसी ही कहानी लिखी जा रही है। यहां गांव की लड़कियां फुटबॉल की ट्रेनिंग ले रही हैं और उन्हें यह हुनर सिखाने वाली हैं भारती मुड़ी।

भारती की खासियत सिर्फ यह नहीं है कि वह लड़कियों को फुटबॉल सिखाती हैं। खास बात यह है कि घरेलू जिम्मेदारियां निभाने के बाद वह साड़ी पहनकर मैदान में उतरती हैं और लड़कियों को फुटबॉल की बारीकियां सिखाती हैं। उनके लिए साड़ी उनके हुनर की राह में कोई रुकावट नहीं, बल्कि उनकी पहचान का हिस्सा है।

उन्हें देखकर शायद पहली नजर में कोई यह अंदाजा न लगा पाए कि यह साधारण-सी दिखने वाली ग्रामीण महिला फुटबॉल की कोच हैं। लेकिन भारती की कहानी यही सिखाती है कि किसी की काबिलियत उसके कपड़ों या उसके रूप से तय नहीं होती। असली पहचान उसके काम और उसके हुनर से होती है।

बचपन से था फुटबॉलर बनने का सपना

हर सपना पूरा हो, यह जरूरी नहीं। कई बार परिस्थितियां और सामाजिक सोच इंसान को उसके सपने से दूर कर देती हैं। भारती के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ।

उन्हें बचपन से फुटबॉल खेलने का शौक था और वह खुद फुटबॉलर बनना चाहती थीं। लेकिन जिस सामाजिक माहौल में वह पली-बढ़ीं, वहां लड़कियों का फुटबॉल खेलना सहजता से स्वीकार नहीं किया जाता था। नतीजा यह हुआ कि उनका अपना सपना अधूरा रह गया।

लेकिन उन्होंने अपने सपने को मरने नहीं दिया। शादी के बाद जब उन्हें पति का सहयोग मिला, तो उन्होंने तय किया कि अगर वह खुद फुटबॉलर नहीं बन सकीं, तो गांव की दूसरी लड़कियों को यह मौका जरूर देंगी।

इसी सोच के साथ 2009 में उन्होंने अपने गांव में लड़कियों के लिए फुटबॉल प्रशिक्षण शुरू किया।

एक लड़की के सपने से शुरू हुआ कारवां

शुरुआत आसान नहीं थी। न कोई बड़ा प्रशिक्षण केंद्र था और न आधुनिक खेल सुविधाएं। भारती ने अपनी बचत से फुटबॉल और जरूरी खेल सामग्री जुटाई और गांव की लड़कियों को प्रशिक्षण देना शुरू किया। सबसे खास बात यह रही कि उन्होंने इसके लिए लड़कियों से कोई फीस नहीं ली।

धीरे-धीरे लड़कियों की संख्या बढ़ने लगी और भारती का छोटा-सा प्रयास एक बड़े बदलाव में बदलने लगा। वह मैदान पर लड़कियों को किकिंग, पासिंग और गोल करने जैसी फुटबॉल की तकनीकें सिखाती हैं। उनके प्रशिक्षण से कई लड़कियां राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुंच चुकी हैं। कुछ खिलाड़ियों ने खेल कोटे के जरिए सरकारी नौकरी भी हासिल की है।

आज जब उनकी छात्राएं मैदान पर उतरती हैं, तो भारती सिर्फ कोच नहीं रहतीं, बल्कि उनकी सबसे बड़ी हौसला बढ़ाने वाली बन जाती हैं। किसी खिलाड़ी का गोल उन्हें खुशी देता है और किसी मौके के चूकने पर वह उतनी ही शिद्दत से निराश भी होती हैं।

जो मेरे साथ हुआ, वह किसी और के साथ नहीं होगा

भारती का अपना सपना सामाजिक रूढ़ियों की वजह से टूट गया था। लेकिन उन्होंने इस टूटन को अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। उन्होंने उसी अनुभव को दूसरी लड़कियों की ताकत बनाने का फैसला किया।

उनका प्रयास सिर्फ फुटबॉल तक सीमित नहीं है। मैदान पर लड़कियों को खेल सिखाने के साथ-साथ वह उन्हें आत्मविश्वास और आगे बढ़ने का हौसला भी देती हैं। उनके लिए फुटबॉल महज एक खेल नहीं, बल्कि गांव की लड़कियों के लिए अपने पैरों पर खड़े होने का एक रास्ता है।

उनकी कहानी का सबसे खूबसूरत पहलू यही है कि जिस खेल को कभी उनके लिए 'लड़कियों का खेल' नहीं माना गया, उसी खेल के मैदान पर आज वह दूसरी लड़कियों के सपनों की कोच बनकर खड़ी हैं।

फुटबॉल ने बदली गांव की लड़कियों की सोच

भारती के प्रयासों का असर मैदान से बाहर भी दिखाई देता है। जिन लड़कियों के सामने कभी कम उम्र में शादी और सीमित अवसर जैसी परिस्थितियां थीं, वे अब फुटबॉल के मैदान पर अपने लिए एक अलग भविष्य देख रही हैं।

उनके प्रशिक्षण से जुड़ी कई लड़कियां राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर खेल चुकी हैं। कुछ को खेल कोटे के जरिए रोजगार भी मिला है।

यह बदलाव सिर्फ कुछ खिलाड़ियों की सफलता नहीं है। यह उस सोच में बदलाव है, जो कभी लड़कियों के सपनों पर सवाल खड़े करती थी। आज वही लड़कियां मैदान पर दौड़ती हैं, गोल करती हैं और अपने लिए नए लक्ष्य तय करती हैं।

साड़ी में मैदान पर उतरती हैं, लेकिन सोच बहुत आगे की है

भारती मुड़ी को देखकर शायद कोई यह सोच सकता है कि साड़ी पहनकर फुटबॉल की कोचिंग कैसे दी जा सकती है। लेकिन उनका पूरा सफर इस सवाल का जवाब है।

कपड़े किसी के हुनर की सीमा तय नहीं करते। मैदान पर भारती की साड़ी नहीं, उनका अनुभव, मेहनत और जुनून दिखाई देता है। पिछले कई वर्षों से वह ग्रामीण और आदिवासी लड़कियों को फुटबॉल से जोड़ने का काम कर रही हैं।

भारती खुद भले ही फुटबॉलर बनने का अपना सपना पूरा नहीं कर सकीं, लेकिन उन्होंने उससे कहीं बड़ा काम कर दिया। उन्होंने अपने अधूरे सपने को दूसरी लड़कियों के पैरों की रफ्तार दे दी।

कभी समाज ने उन्हें फुटबॉल खेलने से रोक दिया था। आज वही भारती मुड़ी गांव की लड़कियों को फुटबॉल खेलना सिखा रही हैं। शायद यही किसी सपने की सबसे खूबसूरत जीत हैजब वह सिर्फ आपका नहीं रहता, बल्कि कई और जिंदगियों का भविष्य बदलने लगता है।

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